क्लाॅसियस-मसोटी समीकरण:- क्लाॅसियस (1850) एवं मसोटी ने मोलर ध्रुवण तथा माध्यम के परावैद्युतांक के बीच एक संबंध स्थापित किया। मात्र दो आवेशित प्लेटों के बीच एक समान विद्युत क्षेत्र की सामर्थ्य Eo है तथा किसी अध्रुवीय माध्यम में क्षेत्र की सामर्थ E हो जाती है, क्योंकि अणुओं में प्रेरित द्विध्रुव, प्रयुक्त विद्युत क्षेत्र के विपरीत कार्य करता है। अतः Eo/E = D (परावैद्युत स्थिरांक) ......(1) जहां D माध्यम का परावैद्युतांक है। विद्युत सांख्यिकी के आधार पर, Eo = E + 4πI DE-E=4πI .......(2) (D-1)E=4πI .......(3) जहां I इकाई आयतन में प्रेरित विद्युत आघूर्ण है। विद्युत क्षेत्र की तीव्रता (F) जो कि प्रत्येक अणु पर कार्यरत है को इस आधार पर ज्ञात किया जा सकता है कि यह कई पदों, जैसे- प्लेटों पर आवेश का क्षेत्र Eo, बल-4πI जो कि प्लेट के संपर्क में परावैद्युत सतह पर प्रेरित बल तथा वृत्ताकार गुहा पर परिणामी प्रेरित बल +4πI/3 का योग है। अतः F=Eo+4πI/3 -4πI ........(4) समीकरण (3) की सहायता से, F=E+4πI/3 = (D+2/3)E ........(5) I=mn तथा (1) व (3) की सहायता से, D-1/D-2 = 4πna ........(6) यदि आवेशित प्लेटों के मध्य माध्यम का घनत्व 'P' तथा अणुभार 'M' हो, तो इकाई आयतन में अणुओं की संख्या n=Np/M (N=ऐवोगेड्रो संख्या) (p=रो) इसे समीकरण (6) में प्रतिस्थापित करने पर, D-1/D+2 .M/p = 4πNa. ......(7) इस समीकरण में बाएं भाग को मोलर ध्रुवण 'P' से व्यक्त किया जाता है। अर्थात् P={D-1/D+2}M/p. ......(8) इस समीकरण को क्लाॅसियस मसोटी समीकरण कहा जाता है तथा P को प्रेरित या विरूपित ध्रुवण भी कहा जाता है। यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि क्लाॅसियस मसोटी समीकरण में D एक संख्या है। अतः मोलर ध्रुवण वास्तव में M/p या मोलर आयतन है व इसका मान ताप से स्वतंत्र होना चाहिए। अतः यह पदार्थ के अध्रुवीय होने पर जब उसमें स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण शून्य है, सन् 1881 में मैक्सवेल ने परावैद्युतांक तथा लंबे तरंगदैर्ध्य के प्रभाव हेतु अपवर्तनांक के बीच संबंध स्थापित किया कि-- D=n square अतः समीकरण (8) को निम्न रूप से भी लिखा जा सकता है---- P=n square-1/n square+2 . M/p=4πNa/3 इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/rau_wlEyYYY
द्विध्रुव आघूर्ण की इकाई:- द्विध्रुव आघूर्ण का मान प्राप्त करने के लिए आवेश को e.s.u. में (स्थिर द्विध्रुव इकाई) में तथा दूरी को cm में व्यक्त करते हैं। द्विध्रुव आघूर्ण
=(4.8×10power of -10 e.s.u.)×(10power of -8 cm) =4.8×10power of -18 e.s.u.cm =4.8डिबाई(1 डिबाई=10power of -18 e.s.u.)=4.8D जहां D डिबाई इकाई है। 10power of -18 e.s.u. cm को एक डिबाई यूनिट माना जाता है। द्विध्रुव आघूर्ण का निर्धारण (determination of dipole moment):- वाष्प ताप विधि(vapour temperature method):- द्विध्रुव आघूर्ण ज्ञात करने के लिए विभिन्न तापों पर पदार्थ का परावैद्युत अंक D तथा घनत्व p(रो) ज्ञात करना लेते हैं। D,M और p(रो) के मान रखकर प्रत्येक ताप पर Pt का मान ज्ञात कर लेते हैं। अब P तथा 1/T के बीच एक ग्राफ खींचते हैं। सरल रेखा के ढाल का मान B के बराबर होता है। B की गणना निम्न प्रकार से करते हैं--
माना CH3CL के लिए प्राप्त सरल रेखा पर दो बिंदु x1 व x2 लिए जिनके नियतांक क्रमशः (P1,1/T1) व (P2,1/T2) हैं। तब x1 के लिए P1=A+B/T1 व P2=A+B/T2 .°. P1-P2=B(1/T-1/T2) .•. B=(P1-P2)/(1/T1-1/T2) अब
समीकरण में B का मान रखकर द्विध्रुव आघूर्ण का मान प्राप्त कर लेते हैं। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/e2KJHkW_RQA By Manjit sahu
द्विध्रुव आघूर्ण:- जब किसी अणु में दो विभिन्न तत्वों के परमाणु रहते हैं, जैसे- हाइड्रोजन तथा क्लोरीन तो बंध में उपस्थित इलेक्ट्रॉन एक परमाणु की अपेक्षा दूसरे की ओर अधिक आकर्षित रहते हैं, जैसे-HCl में इलेक्ट्राॅन हाइड्रोजन की अपेक्षा क्लोरीन की ओर अधिक आकर्षित रहते हैं जिससे क्लोरीन पर कुछ ऋणात्मक आवेश तथा हाइड्रोजन पर समान धनात्मक आवेश उत्पन्न हो जाता है। अतः HCl के अणु को एक आण्विक द्विध्रुव H+➖Cl- के रूप में दर्शा सकते हैं। परिभाषा एक द्विध्रुव अणु में धनात्मक या ऋणात्मक केंद्र पर विद्युत आवेश e तथा उनके मध्य दूरी d का गुणनफल द्विध्रुव आघूर्ण कहलाता है।
यदि एक इकाई धन आवेश एक इलेक्ट्रॉन से 1 A° दूरी पर स्थित हो, तो द्विध्रुcव आघूर्ण =(4.8×10power of -10 e.s.u.)×(10power of -8 cm) =4.8×10power of -18 e.s.u.cm =4.8डिबाई(1 डिबाई=10power of -18 e.s.u.) वाष्प ताप विधि(vapour temperature method):- द्विध्रुव आघूर्ण ज्ञात करने के लिए विभिन्न तापों पर पदार्थ का परावैद्युत अंक D तथा घनत्व p(रो) ज्ञात करना लेते हैं। D,M और p(रो) के मान रखकर प्रत्येक ताप पर Pt का मान ज्ञात कर लेते हैं। अब P तथा 1/T के बीच एक ग्राफ खींचते हैं। सरल रेखा के ढाल का मान B के बराबर होता है। B की गणना निम्न प्रकार से करते हैं--
माना CH3CL के लिए प्राप्त सरल रेखा पर दो बिंदु x1 व x2 लिए जिनके नियतांक क्रमशः (P1,1/T1) व (P2,1/T2) हैं। तब x1 के लिए P1=A+B/T1 व P2=A+B/T2 .°. P1-P2=B(1/T-1/T2) .•. B=(P1-P2)/(1/T1-1/T2) अब
समीकरण में B का मान रखकर द्विध्रुव आघूर्ण का मान प्राप्त कर लेते हैं। द्विध्रुव आघूर्ण तथा आण्विक संरचना:-द्विध्रुव आघूर्ण का मान ज्ञात करने होने पर अणु की संरचना के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। संरचना संबंधी जानकारी प्राप्त होने के कुछ उदाहरण निम्नवत् हैं-- (१) एक परमाणु गैसों ( जैसे- हिलियम, आर्गन आदि) का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है। (२) द्विपरमाणुक अणुओं में विद्युत ऋणात्मक समान होने पर द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है। परंतु HCl,HBr आदि अणुओं का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य से अधिक होता है। (३)CO2,CS2 आदि त्रिपरमाणुक अणु संयमित या असममित हो सकते हैं। CO2,CS2 आदि का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है तथा इनके अणु रेखीय होते हैं। O=C=O S=C=S कार्बन डाइऑक्साइड कार्बन डाईसल्फाइड (४) जल के अणु के लिए द्विध्रुव आघूर्ण 1.84D है तथा इसका बंध कोण 105•6' है यह 'V' आकार का होता है। इसी प्रकार H2S,SO2 आदि का द्विध्रुव आघूर्ण, कोणीय संरचना होने के कारण शून्य से अधिक होता है। इस लिंक पर जाएं 👇👇👇 https://youtu.be/rau_wlEyYYY By Manjit sahu
प्रति चुंबकीय व्यवहार की व्याख्या:- इलेक्ट्रॉन एक आवेशित कण है जिसके चक्रण से चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। किसी परमाणु या अणु के भरे हुए आर्बिटल में यदि विपरीत चक्रण वाले दो अयुग्मित इलेक्ट्रान है तो उस उनके चुंबकीय आघूर्ण एक दूसरे को नष्ट या निरस्त कर देते हैं। अतः ऐसे पदार्थ जिनमें युग्मित इलेक्ट्रॉन या पूर्णतः भरे हुए आर्बिटल होते हैं, उनके परिणामी चुंबकीय आघूर्ण शून्य होते हैं। अधिकांश अणुओं में सम संख्या में इलेक्ट्रॉन होते हैं इसलिए अधिकांश अणुओं के परिणामी चुंबकीय आघूर्ण शून्य होते हैं। अतः वे अणु जिनमें विपरीत चक्रण वाले युग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं प्रति चुंबकीय व्यवहार दर्शाते हैं। जब इलेक्ट्रॉन पूर्ण पूरित में होते हैं तो उनका परिणामी आघूर्ण शून्य होता है किंतु बाह्य चुंबकीय क्षेत्र लगाने पर उनके आघूर्ण में परिवर्तन हो जाता है जिससे प्रति चुंबकत्व उत्पन्न होता है। अनु चुंबकीय व्यवहार:- परमाणु, अणु अथवा आयन जिनमें एक या अधिक अयुग्मित या विषम इलेक्ट्रॉनों वाली आर्बिटल होते हैं उनके चुंबकीय आघूर्ण एक दूसरे से निरस्त नहीं होते हैं। अतः ऐसे पदार्थों में स्थायी चुंबकीय आघूर्ण होता है। ये पदार्थ अनु चुंबकीय कहलाते हैं। अणु के नाभिक लड्डू के समान अपने अक्ष पर चक्रण करते रहते हैं अतः इलेक्ट्रॉनों के चक्रण कोणीय संवेग की भांति नाभिकों के भी चक्रण कोणीय संवेग होते हैं जिसके कारण उनका भी चुंबकीय आघूर्ण होता है। नाभिकों के चक्रण कोड़ी संवेग के कारण भी पदार्थ में अनुचुंबकीय प्रभाव उत्पन्न होता है अतः इनसे उत्पन्न अनुचुंबकत्व अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों के कारण उत्पन्न अनुचुंबकीय प्रभाव की तुलना में नगण्य होता है। बहुत से पदार्थों में इलेक्ट्राॅन आर्बिटल गति तथा इलेक्ट्राॅन चक्रण का चुंबकीय आघूर्ण भरे हुए आर्बिटलों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होने के कारण निरस्त हो जाता है। बहुत से दुर्लभ मृदा तथा संक्रमण तत्वों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होने के कारण वे अनुचुंबकीय होते हैं। ऑक्सीजन अणु में दो अयुग्मित इलेक्ट्राॅन होने के कारण यह अनुचुंबकीय है। अनुचुंबकीय आयन या अणु का चुंबकीय आघूर्ण बोर मैग्नेट्रॉन में व्यक्त करते हैं।
e= इलेक्ट्रॉन का आवेश, m= इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान, c= प्रकाश का वेग 1B.M.=9.273×10की घात -21 अर्ग/गाॅस
लौह चुंबकत्व की व्याख्या आयरन(Fe) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2,2s2,2p6,3s2 है। 3p6 तथा उसके पहले के सभी उप ऊर्जा स्तर पूर्णतः भरे हुए हैं। Fe++ और Fe+++ आयनों के d आर्बिटल में इलेक्ट्रॉनों का वितरण निम्न प्रकार है-- Fe++=2,1,1,1,1 Fe+++=1,1,1,1,1 Fe++ में चार तथा Fe+++ में पांच अयुग्मित इलेक्ट्रॉन स्पिन हैं। ये स्पिन एक दूसरे से समांतर रूप में संरेखित रहते हैं। इसी संयुक्त संरेखण के कारण पदार्थ में प्रबल चुंबकत्व होता है। Fe,Co,Ni,Gd,Dy तथा उनके कुछ मिश्रधातु और यौगिक लौह चुंबकीय होते हैं। इस लिंक पर जाएं 👇👇👇 https://youtu.be/Lkvz2838SIc By Manjit Sahu
ध्रुवण घूर्णकता(optical activity):- ध्रुवण घूर्णकता पूर्णतः संघटनात्मक/संरचनात्मक गुण है। साधारण प्रकाश में अनुप्रस्थ तरंग गति होती है जिसमें प्रकाश के संचरण की दिशा के लंबरूप किसी भी तल में दोलन हो सकते हैं। यदि किसी प्रकार से ऐसा प्रकाश प्राप्त किया जाए जिसमें सभी दोलन एक ही तल में हो तो ऐसा प्रकाश समतल ध्रुवित प्रकाश कहलाता है तथा उसके तल को ध्रुवण तल कहते हैं। ऐसे समतल ध्रुवित प्रकाश के किरण पुंज को यदि किसी ऐसे द्रव या ठोस के विलयन में प्रवाहित किया जाए जिससे प्रकाश का ध्रुवण तल घूम जाए तो इस गुण को ध्रुवण घूर्णकता कहते हैं तथा वे पदार्थ जो ध्रुवण तल को घुमाते हैं ध्रुवण घूर्णक पदार्थ कहलाते हैं। वे पदार्थ जो प्रकाश के घूर्णन तल को दक्षिणावर्त दिशा में घुमाते हैं दक्षिण ध्रुवण घूर्णक तथा जो वामावर्त दिशा में घुमाते वाम घूर्णक कहलाते हैं। ध्रुवण घूर्णकता का गुण केवल उन्हीं पदार्थों में पाया जाता है जिनके अणुओं में असममित कार्बन परमाणु होता है। ध्रुवण तल जितने अंश घूमता है उसे घूर्णन का कोण कहते हैं। यदि सोडियम प्रकाश को D रेखा के तरंगदैर्ध्य को लेमडा D से दर्शायें तो t °C पर किसी द्रव या विलियन के अपेक्षिक घूर्णन को निम्न समीकरण द्वारा व्यक्त करते हैं--
यदि पदार्थ का विलियन लिया जाए तो घनत्व के स्थान पर सांद्रता प्रति घन सेंटीमीटर लिया जाता है।
अतः समतल ध्रुवित प्रकाश को 1 डेसीमीटर लंबाई तथा 1 ग्राम प्रति मिलीलीटर सांद्रता वालेविलियन से गुजारने पर समतल ध्रुवित प्रकाश का तल जितने डिग्री से घूम जाता है वह उस विलियन के घुले हुए पदार्थ का आपेक्षिक घूर्णन कहलाता है।
घूर्णन विलियन में उपस्थित पदार्थ की सांद्रता पर निर्भर होता है। यदि m ग्राम पदार्थ 100ml विलायक में विलेय हो, तो
अपेक्षित घूर्णन को अणुभार से गुणा करने पर आण्विक घूर्णक प्राप्त होता है । आण्विक घूर्णन
ऊष्मागतिकी के तृतीय नियम की सहायता से ठोस क्रिस्टल पदार्थों में परम एंट्रॉपी का निर्धारण:- ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम से स्थिर दाब पर एंट्रॉफी परिवर्तन के लिए व्यंजक है-
ऊष्मागतिकी के तृतीय नियम के अनुसार परम शून्य ताप ( T= 0 ) पर विशुद्ध क्रिस्टलीय पदार्थों की परम एण्ट्रॉपी शून्य (S=0) होती है। समीकरण (1) का और T=T (ऐच्छिक ताप) के बीच समाकलन करने पर,
ST क्रिस्टलीय ठोस की T ताप पर परम एण्ट्रॉपी है। समीकरण (3) से स्पष्ट है कि यदि T=0 तथा T=T अर्थात् ऐच्छिक ताप के बीच विभिन्न तापों पर क्रिस्टलीय पदार्थों की ऊष्माधारिता ज्ञात हो तो परम एण्ट्रॉपी का मान ज्ञात किया जा सकता है। समीकरण (3) का समाकलन प्राप्त करने के लिए विभिन्नता तापों पर पदार्थ की उष्माधारिता Cp का मापन किया जाता है तत्पश्चात Cp तथा ln T के मध्य ग्राफ खींचा जाता है।इस प्रकार प्राप्त वक्र के नीचे वाला क्षेत्रफल ABC क्रिस्टलीय पदार्थ की T ताप पर परम एण्ट्रॉपी ST होती है। यह क्षेत्रफल छायित भाग द्वारा दर्शाया गया है।
परम शून्य पर Cp का मापन संभव नहीं है। अतः Cp का मापन ऐच्छिक ताप (T) से कम से कम ताप (10 से 15k) जहां तक संभव हो ज्ञात करते हैं फिर केवल मापे गए Cp के मानों तथा ln T के मध्य ग्राफ खींचते हैं। 10 से 15k से कम ताप पर Cp ज्ञात करने के लिए वक्र का बिंदु B से A तक बहिर्वेशन करते हैं। इस प्रकार बहिर्वेशन से 10 से 15k से कम ताप पर भी Cp का मान ज्ञात हो जाता है।
परिचय:- नर्नस्ट ऊष्मा प्रमेय के अनुसार परम शून्य पर अभिकारकों तथा क्रियाफलों की ठोस अवस्था में एण्ट्रॉपी का अंतर शून्य हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि परम शून्य ताप पर ठोस अवस्था में अभिकारकों तथा क्रियाफलों की एण्ट्रॉपियां एकसमान होती है। इस आधार पर प्लांक ने कहा कि शुद्ध ठोसों की एण्ट्रॉपियां कम होते होते परम शून्य ताप पर शून्य हो जाती है। इस आधार पर, lim S = 0 T--->0 ऊष्मागतिकी का तृतीय नियम:- परम शून्य ताप पर सभी विशुद्ध क्रिस्टलीय ठोस पदार्थों की एण्ट्रॉपी शून्य हो जाती है। स्पष्टीकरण:- क्रिस्टलीय ठोस में क्रिस्टल नियमित रूप से व्यवस्थित रहते हैं तथा परम शून्य ताप पर अनियमितता शून्य होती है। अतः शुद्ध क्रिस्टलीय पदार्थों की परम शून्य ताप पर एण्ट्रॉपी शून्य होती है। उपयोगिता:- इस नियम की सहायता से शुद्ध क्रिस्टलीय पदार्थों की परम एण्ट्रॉपी की गणना की जा सकती है। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/Zit3uLYGztQ By Manjit sahu