क्लाॅसियस-मसोटी समीकरण:- क्लाॅसियस (1850) एवं मसोटी ने मोलर ध्रुवण तथा माध्यम के परावैद्युतांक के बीच एक संबंध स्थापित किया। मात्र दो आवेशित प्लेटों के बीच एक समान विद्युत क्षेत्र की सामर्थ्य Eo है तथा किसी अध्रुवीय माध्यम में क्षेत्र की सामर्थ E हो जाती है, क्योंकि अणुओं में प्रेरित द्विध्रुव, प्रयुक्त विद्युत क्षेत्र के विपरीत कार्य करता है। अतः Eo/E = D (परावैद्युत स्थिरांक) ......(1) जहां D माध्यम का परावैद्युतांक है। विद्युत सांख्यिकी के आधार पर, Eo = E + 4πI DE-E=4πI .......(2) (D-1)E=4πI .......(3) जहां I इकाई आयतन में प्रेरित विद्युत आघूर्ण है। विद्युत क्षेत्र की तीव्रता (F) जो कि प्रत्येक अणु पर कार्यरत है को इस आधार पर ज्ञात किया जा सकता है कि यह कई पदों, जैसे- प्लेटों पर आवेश का क्षेत्र Eo, बल-4πI जो कि प्लेट के संपर्क में परावैद्युत सतह पर प्रेरित बल तथा वृत्ताकार गुहा पर परिणामी प्रेरित बल +4πI/3 का योग है। अतः F=Eo+4πI/3 -4πI ........(4) समीकरण (3) की सहायता से, F=E+4πI/3 = (D+2/3)E ........(5) I=mn तथा (1) व (3) की सहायता से, D-1/D-2 = 4πna ........(6) यदि आवेशित प्लेटों के मध्य माध्यम का घनत्व 'P' तथा अणुभार 'M' हो, तो इकाई आयतन में अणुओं की संख्या n=Np/M (N=ऐवोगेड्रो संख्या) (p=रो) इसे समीकरण (6) में प्रतिस्थापित करने पर, D-1/D+2 .M/p = 4πNa. ......(7) इस समीकरण में बाएं भाग को मोलर ध्रुवण 'P' से व्यक्त किया जाता है। अर्थात् P={D-1/D+2}M/p. ......(8) इस समीकरण को क्लाॅसियस मसोटी समीकरण कहा जाता है तथा P को प्रेरित या विरूपित ध्रुवण भी कहा जाता है। यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि क्लाॅसियस मसोटी समीकरण में D एक संख्या है। अतः मोलर ध्रुवण वास्तव में M/p या मोलर आयतन है व इसका मान ताप से स्वतंत्र होना चाहिए। अतः यह पदार्थ के अध्रुवीय होने पर जब उसमें स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण शून्य है, सन् 1881 में मैक्सवेल ने परावैद्युतांक तथा लंबे तरंगदैर्ध्य के प्रभाव हेतु अपवर्तनांक के बीच संबंध स्थापित किया कि-- D=n square अतः समीकरण (8) को निम्न रूप से भी लिखा जा सकता है---- P=n square-1/n square+2 . M/p=4πNa/3 इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/rau_wlEyYYY
द्विध्रुव आघूर्ण की इकाई:- द्विध्रुव आघूर्ण का मान प्राप्त करने के लिए आवेश को e.s.u. में (स्थिर द्विध्रुव इकाई) में तथा दूरी को cm में व्यक्त करते हैं। द्विध्रुव आघूर्ण
=(4.8×10power of -10 e.s.u.)×(10power of -8 cm) =4.8×10power of -18 e.s.u.cm =4.8डिबाई(1 डिबाई=10power of -18 e.s.u.)=4.8D जहां D डिबाई इकाई है। 10power of -18 e.s.u. cm को एक डिबाई यूनिट माना जाता है। द्विध्रुव आघूर्ण का निर्धारण (determination of dipole moment):- वाष्प ताप विधि(vapour temperature method):- द्विध्रुव आघूर्ण ज्ञात करने के लिए विभिन्न तापों पर पदार्थ का परावैद्युत अंक D तथा घनत्व p(रो) ज्ञात करना लेते हैं। D,M और p(रो) के मान रखकर प्रत्येक ताप पर Pt का मान ज्ञात कर लेते हैं। अब P तथा 1/T के बीच एक ग्राफ खींचते हैं। सरल रेखा के ढाल का मान B के बराबर होता है। B की गणना निम्न प्रकार से करते हैं--
माना CH3CL के लिए प्राप्त सरल रेखा पर दो बिंदु x1 व x2 लिए जिनके नियतांक क्रमशः (P1,1/T1) व (P2,1/T2) हैं। तब x1 के लिए P1=A+B/T1 व P2=A+B/T2 .°. P1-P2=B(1/T-1/T2) .•. B=(P1-P2)/(1/T1-1/T2) अब
समीकरण में B का मान रखकर द्विध्रुव आघूर्ण का मान प्राप्त कर लेते हैं। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/e2KJHkW_RQA By Manjit sahu
द्विध्रुव आघूर्ण:- जब किसी अणु में दो विभिन्न तत्वों के परमाणु रहते हैं, जैसे- हाइड्रोजन तथा क्लोरीन तो बंध में उपस्थित इलेक्ट्रॉन एक परमाणु की अपेक्षा दूसरे की ओर अधिक आकर्षित रहते हैं, जैसे-HCl में इलेक्ट्राॅन हाइड्रोजन की अपेक्षा क्लोरीन की ओर अधिक आकर्षित रहते हैं जिससे क्लोरीन पर कुछ ऋणात्मक आवेश तथा हाइड्रोजन पर समान धनात्मक आवेश उत्पन्न हो जाता है। अतः HCl के अणु को एक आण्विक द्विध्रुव H+➖Cl- के रूप में दर्शा सकते हैं। परिभाषा एक द्विध्रुव अणु में धनात्मक या ऋणात्मक केंद्र पर विद्युत आवेश e तथा उनके मध्य दूरी d का गुणनफल द्विध्रुव आघूर्ण कहलाता है।
यदि एक इकाई धन आवेश एक इलेक्ट्रॉन से 1 A° दूरी पर स्थित हो, तो द्विध्रुcव आघूर्ण =(4.8×10power of -10 e.s.u.)×(10power of -8 cm) =4.8×10power of -18 e.s.u.cm =4.8डिबाई(1 डिबाई=10power of -18 e.s.u.) वाष्प ताप विधि(vapour temperature method):- द्विध्रुव आघूर्ण ज्ञात करने के लिए विभिन्न तापों पर पदार्थ का परावैद्युत अंक D तथा घनत्व p(रो) ज्ञात करना लेते हैं। D,M और p(रो) के मान रखकर प्रत्येक ताप पर Pt का मान ज्ञात कर लेते हैं। अब P तथा 1/T के बीच एक ग्राफ खींचते हैं। सरल रेखा के ढाल का मान B के बराबर होता है। B की गणना निम्न प्रकार से करते हैं--
माना CH3CL के लिए प्राप्त सरल रेखा पर दो बिंदु x1 व x2 लिए जिनके नियतांक क्रमशः (P1,1/T1) व (P2,1/T2) हैं। तब x1 के लिए P1=A+B/T1 व P2=A+B/T2 .°. P1-P2=B(1/T-1/T2) .•. B=(P1-P2)/(1/T1-1/T2) अब
समीकरण में B का मान रखकर द्विध्रुव आघूर्ण का मान प्राप्त कर लेते हैं। द्विध्रुव आघूर्ण तथा आण्विक संरचना:-द्विध्रुव आघूर्ण का मान ज्ञात करने होने पर अणु की संरचना के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। संरचना संबंधी जानकारी प्राप्त होने के कुछ उदाहरण निम्नवत् हैं-- (१) एक परमाणु गैसों ( जैसे- हिलियम, आर्गन आदि) का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है। (२) द्विपरमाणुक अणुओं में विद्युत ऋणात्मक समान होने पर द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है। परंतु HCl,HBr आदि अणुओं का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य से अधिक होता है। (३)CO2,CS2 आदि त्रिपरमाणुक अणु संयमित या असममित हो सकते हैं। CO2,CS2 आदि का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है तथा इनके अणु रेखीय होते हैं। O=C=O S=C=S कार्बन डाइऑक्साइड कार्बन डाईसल्फाइड (४) जल के अणु के लिए द्विध्रुव आघूर्ण 1.84D है तथा इसका बंध कोण 105•6' है यह 'V' आकार का होता है। इसी प्रकार H2S,SO2 आदि का द्विध्रुव आघूर्ण, कोणीय संरचना होने के कारण शून्य से अधिक होता है। इस लिंक पर जाएं 👇👇👇 https://youtu.be/rau_wlEyYYY By Manjit sahu
प्रति चुंबकीय व्यवहार की व्याख्या:- इलेक्ट्रॉन एक आवेशित कण है जिसके चक्रण से चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। किसी परमाणु या अणु के भरे हुए आर्बिटल में यदि विपरीत चक्रण वाले दो अयुग्मित इलेक्ट्रान है तो उस उनके चुंबकीय आघूर्ण एक दूसरे को नष्ट या निरस्त कर देते हैं। अतः ऐसे पदार्थ जिनमें युग्मित इलेक्ट्रॉन या पूर्णतः भरे हुए आर्बिटल होते हैं, उनके परिणामी चुंबकीय आघूर्ण शून्य होते हैं। अधिकांश अणुओं में सम संख्या में इलेक्ट्रॉन होते हैं इसलिए अधिकांश अणुओं के परिणामी चुंबकीय आघूर्ण शून्य होते हैं। अतः वे अणु जिनमें विपरीत चक्रण वाले युग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं प्रति चुंबकीय व्यवहार दर्शाते हैं। जब इलेक्ट्रॉन पूर्ण पूरित में होते हैं तो उनका परिणामी आघूर्ण शून्य होता है किंतु बाह्य चुंबकीय क्षेत्र लगाने पर उनके आघूर्ण में परिवर्तन हो जाता है जिससे प्रति चुंबकत्व उत्पन्न होता है। अनु चुंबकीय व्यवहार:- परमाणु, अणु अथवा आयन जिनमें एक या अधिक अयुग्मित या विषम इलेक्ट्रॉनों वाली आर्बिटल होते हैं उनके चुंबकीय आघूर्ण एक दूसरे से निरस्त नहीं होते हैं। अतः ऐसे पदार्थों में स्थायी चुंबकीय आघूर्ण होता है। ये पदार्थ अनु चुंबकीय कहलाते हैं। अणु के नाभिक लड्डू के समान अपने अक्ष पर चक्रण करते रहते हैं अतः इलेक्ट्रॉनों के चक्रण कोणीय संवेग की भांति नाभिकों के भी चक्रण कोणीय संवेग होते हैं जिसके कारण उनका भी चुंबकीय आघूर्ण होता है। नाभिकों के चक्रण कोड़ी संवेग के कारण भी पदार्थ में अनुचुंबकीय प्रभाव उत्पन्न होता है अतः इनसे उत्पन्न अनुचुंबकत्व अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों के कारण उत्पन्न अनुचुंबकीय प्रभाव की तुलना में नगण्य होता है। बहुत से पदार्थों में इलेक्ट्राॅन आर्बिटल गति तथा इलेक्ट्राॅन चक्रण का चुंबकीय आघूर्ण भरे हुए आर्बिटलों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होने के कारण निरस्त हो जाता है। बहुत से दुर्लभ मृदा तथा संक्रमण तत्वों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होने के कारण वे अनुचुंबकीय होते हैं। ऑक्सीजन अणु में दो अयुग्मित इलेक्ट्राॅन होने के कारण यह अनुचुंबकीय है। अनुचुंबकीय आयन या अणु का चुंबकीय आघूर्ण बोर मैग्नेट्रॉन में व्यक्त करते हैं।
e= इलेक्ट्रॉन का आवेश, m= इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान, c= प्रकाश का वेग 1B.M.=9.273×10की घात -21 अर्ग/गाॅस
लौह चुंबकत्व की व्याख्या आयरन(Fe) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2,2s2,2p6,3s2 है। 3p6 तथा उसके पहले के सभी उप ऊर्जा स्तर पूर्णतः भरे हुए हैं। Fe++ और Fe+++ आयनों के d आर्बिटल में इलेक्ट्रॉनों का वितरण निम्न प्रकार है-- Fe++=2,1,1,1,1 Fe+++=1,1,1,1,1 Fe++ में चार तथा Fe+++ में पांच अयुग्मित इलेक्ट्रॉन स्पिन हैं। ये स्पिन एक दूसरे से समांतर रूप में संरेखित रहते हैं। इसी संयुक्त संरेखण के कारण पदार्थ में प्रबल चुंबकत्व होता है। Fe,Co,Ni,Gd,Dy तथा उनके कुछ मिश्रधातु और यौगिक लौह चुंबकीय होते हैं। इस लिंक पर जाएं 👇👇👇 https://youtu.be/Lkvz2838SIc By Manjit Sahu
ध्रुवण घूर्णकता(optical activity):- ध्रुवण घूर्णकता पूर्णतः संघटनात्मक/संरचनात्मक गुण है। साधारण प्रकाश में अनुप्रस्थ तरंग गति होती है जिसमें प्रकाश के संचरण की दिशा के लंबरूप किसी भी तल में दोलन हो सकते हैं। यदि किसी प्रकार से ऐसा प्रकाश प्राप्त किया जाए जिसमें सभी दोलन एक ही तल में हो तो ऐसा प्रकाश समतल ध्रुवित प्रकाश कहलाता है तथा उसके तल को ध्रुवण तल कहते हैं। ऐसे समतल ध्रुवित प्रकाश के किरण पुंज को यदि किसी ऐसे द्रव या ठोस के विलयन में प्रवाहित किया जाए जिससे प्रकाश का ध्रुवण तल घूम जाए तो इस गुण को ध्रुवण घूर्णकता कहते हैं तथा वे पदार्थ जो ध्रुवण तल को घुमाते हैं ध्रुवण घूर्णक पदार्थ कहलाते हैं। वे पदार्थ जो प्रकाश के घूर्णन तल को दक्षिणावर्त दिशा में घुमाते हैं दक्षिण ध्रुवण घूर्णक तथा जो वामावर्त दिशा में घुमाते वाम घूर्णक कहलाते हैं। ध्रुवण घूर्णकता का गुण केवल उन्हीं पदार्थों में पाया जाता है जिनके अणुओं में असममित कार्बन परमाणु होता है। ध्रुवण तल जितने अंश घूमता है उसे घूर्णन का कोण कहते हैं। यदि सोडियम प्रकाश को D रेखा के तरंगदैर्ध्य को लेमडा D से दर्शायें तो t °C पर किसी द्रव या विलियन के अपेक्षिक घूर्णन को निम्न समीकरण द्वारा व्यक्त करते हैं--
यदि पदार्थ का विलियन लिया जाए तो घनत्व के स्थान पर सांद्रता प्रति घन सेंटीमीटर लिया जाता है।
अतः समतल ध्रुवित प्रकाश को 1 डेसीमीटर लंबाई तथा 1 ग्राम प्रति मिलीलीटर सांद्रता वालेविलियन से गुजारने पर समतल ध्रुवित प्रकाश का तल जितने डिग्री से घूम जाता है वह उस विलियन के घुले हुए पदार्थ का आपेक्षिक घूर्णन कहलाता है।
घूर्णन विलियन में उपस्थित पदार्थ की सांद्रता पर निर्भर होता है। यदि m ग्राम पदार्थ 100ml विलायक में विलेय हो, तो
अपेक्षित घूर्णन को अणुभार से गुणा करने पर आण्विक घूर्णक प्राप्त होता है । आण्विक घूर्णन
ऊष्मागतिकी के तृतीय नियम की सहायता से ठोस क्रिस्टल पदार्थों में परम एंट्रॉपी का निर्धारण:- ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम से स्थिर दाब पर एंट्रॉफी परिवर्तन के लिए व्यंजक है-
ऊष्मागतिकी के तृतीय नियम के अनुसार परम शून्य ताप ( T= 0 ) पर विशुद्ध क्रिस्टलीय पदार्थों की परम एण्ट्रॉपी शून्य (S=0) होती है। समीकरण (1) का और T=T (ऐच्छिक ताप) के बीच समाकलन करने पर,
ST क्रिस्टलीय ठोस की T ताप पर परम एण्ट्रॉपी है। समीकरण (3) से स्पष्ट है कि यदि T=0 तथा T=T अर्थात् ऐच्छिक ताप के बीच विभिन्न तापों पर क्रिस्टलीय पदार्थों की ऊष्माधारिता ज्ञात हो तो परम एण्ट्रॉपी का मान ज्ञात किया जा सकता है। समीकरण (3) का समाकलन प्राप्त करने के लिए विभिन्नता तापों पर पदार्थ की उष्माधारिता Cp का मापन किया जाता है तत्पश्चात Cp तथा ln T के मध्य ग्राफ खींचा जाता है।इस प्रकार प्राप्त वक्र के नीचे वाला क्षेत्रफल ABC क्रिस्टलीय पदार्थ की T ताप पर परम एण्ट्रॉपी ST होती है। यह क्षेत्रफल छायित भाग द्वारा दर्शाया गया है।
परम शून्य पर Cp का मापन संभव नहीं है। अतः Cp का मापन ऐच्छिक ताप (T) से कम से कम ताप (10 से 15k) जहां तक संभव हो ज्ञात करते हैं फिर केवल मापे गए Cp के मानों तथा ln T के मध्य ग्राफ खींचते हैं। 10 से 15k से कम ताप पर Cp ज्ञात करने के लिए वक्र का बिंदु B से A तक बहिर्वेशन करते हैं। इस प्रकार बहिर्वेशन से 10 से 15k से कम ताप पर भी Cp का मान ज्ञात हो जाता है।
परिचय:- नर्नस्ट ऊष्मा प्रमेय के अनुसार परम शून्य पर अभिकारकों तथा क्रियाफलों की ठोस अवस्था में एण्ट्रॉपी का अंतर शून्य हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि परम शून्य ताप पर ठोस अवस्था में अभिकारकों तथा क्रियाफलों की एण्ट्रॉपियां एकसमान होती है। इस आधार पर प्लांक ने कहा कि शुद्ध ठोसों की एण्ट्रॉपियां कम होते होते परम शून्य ताप पर शून्य हो जाती है। इस आधार पर, lim S = 0 T--->0 ऊष्मागतिकी का तृतीय नियम:- परम शून्य ताप पर सभी विशुद्ध क्रिस्टलीय ठोस पदार्थों की एण्ट्रॉपी शून्य हो जाती है। स्पष्टीकरण:- क्रिस्टलीय ठोस में क्रिस्टल नियमित रूप से व्यवस्थित रहते हैं तथा परम शून्य ताप पर अनियमितता शून्य होती है। अतः शुद्ध क्रिस्टलीय पदार्थों की परम शून्य ताप पर एण्ट्रॉपी शून्य होती है। उपयोगिता:- इस नियम की सहायता से शुद्ध क्रिस्टलीय पदार्थों की परम एण्ट्रॉपी की गणना की जा सकती है। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/Zit3uLYGztQ By Manjit sahu
प्रकाश सुग्राहीकारक:- कुछ प्रकाश रसायनिक अभिक्रियाओं में अभिकारक सीधे ही प्रकाश का अवशोषण नहीं कर सकते किंतु यदि अभिकारक में कोई ऐसा बाहरी पदार्थ मिला दिया जाए जो प्रकाश का अवशोषण कर ले किंतु क्रिया में भाग न ले तथा अवशोषित ऊर्जा को अभिकारक को स्थानांतरित कर दे जिससे अभिकारक के अणु प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया में भाग ले सकें तो ऐसी अभिक्रियाएं प्रकाश सुग्राही(photo sensitized) अभिक्रियाएं तथा यह घटना प्रकाश सुग्राहीकरण ( photo sensitization) कहलाती है। प्रकाश अवशोषित करने वाला पदार्थ प्रकाश सुग्राहीकारक(photo sensitizer) कहलाता है। उदाहरण:- (1) यदि H2 अणु को 2537A° वाली विकिरणों से प्रकार प्रकाशित किया जाए तो उसका वियोजन नहीं होता है किंतु Hg वाष्प की उपस्थिति में इन्हीं विकिरणों द्वारा वियोजन हो जाता है। Hg परमाणु फोटाॅन का अवशोषण कर उत्तेजित परमाणु बन जाता है। Hg + hv -------> Hg* Hg* हाइड्रोजन अणु से टकराकर अवशोषित ऊर्जा H2 को दे देता है। इससे H2 अणु का वियोजन हो जाता है। अतः इस प्रकाश रसायनिक अभिक्रिया में Hg वाष्प प्रकाश सुग्राहीकारक का कार्य करता है। Hg + H2 ---------> H2* + Hg H2* ---------> H + H (2) पौधों में कार्बोहाइड्रेट का संश्लेषण एक अन्य महत्वपूर्ण उदाहरण है। पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में Co2 तथा H2O की अभिक्रिया से कार्बोहाइड्रेट बनाते हैं।
Co2 + H2O + hv ----------> 1/6(C6H12O6) + O2
यहां Co2 और H2O दोनों ही दृश्य प्रकाश का अवशोषण नहीं कर सकते किंतु जीवित पौधों में उपस्थित क्लोरोफिल दृश्य प्रकाश का अवशोषण करके Co2 और H2O अणुओं को ऊर्जा का स्थानांतरण कर देता है तथा कार्बोहाइड्रेट बनता है। (3) जल वाष्प वियोजन-- Hg + hv ---2537A°---- > Hg* Hg + H2O -----> Hg + H + OH 2OH ----------> H2O2 (4) ऑक्सीजन का ओजोनीकरण-- Hg + hv ----2537A°------> Hg* Hg* + 3O2 -----------> 2O3 + Hg इस लिंक पर जाए 👇 👇👇 https://youtu.be/vr58YdnKlZw
जेबलाॅन्सकी आरेख:- प्रत्येक अणु एक क्वांटम विकिरण का अवशोषण करके प्रकाश रासायनिक सक्रिय हो जाता है। सक्रियित अणु में प्रारंभिक प्रक्रमों का घटित होना जेबलोन्स्की आरेख द्वारा दर्शाया जा सकता है। स्फुरदीप्ति और प्रतिदीप्ति घटनाओं को भी जेबलोन्स्की आरेख द्वारा समझाया जा सकता है। यदि अणु की किसी अवस्था में S कुल इलेक्ट्रॉन स्पिन को दर्शाता है तो (2s+1) उस अवस्था की स्पिन बहुलता(spin multiplicity) होगी। जब किसी आर्बिटल में स्पिन युग्मित(paired spin) होते हैं तब इलेक्ट्रान स्पिन का ऊपर की ओर अभिविन्यास नीचे की ओर अभिविन्यास से निरस्त हो जाता है जिससे अणु का कुल इलेक्ट्राॅन स्पिन S=0 हो जाएगा। S1=+1/2 और S2=-1/2 S1+S2=+1/2-1/2=0 स्पिन बहुलता 2S+1=2×0+1=1
इस स्थिति को इस प्रकार कहा जा सकता है कि अणु अपनी एकक मूल अवस्था(singlet ground state) में है जैसा ऊपर के चित्र में दर्शाया गया हैं। जब मूल अवस्था में उपयुक्त विकिरण के फोटॉन के अवशोषण से युग्मित इलेक्ट्रॉनों से एक इलेक्ट्रॉन प्रथम उत्तेजित इलेक्ट्रॉनिक अवस्था में पहुंच जाता है तो मूल अवस्था तथा उत्तेजित अवस्था में दोनों इलेक्ट्रॉनों के स्पिन अभिविन्यास समदिश या प्रति समानांतर ( anti parallel) हो सकते हैं जैसा नीचे के चित्रों में दर्शाया गया है।
समदिश/ समानांतर स्पिन-- S1=+1/2 और S2=+1/2 S1+S2=+1/2+1/2 (2S+1)=2×1+1=3 अतः अणु की स्पिन बहुलता 3 है तथा अणु अपनी त्रिक उत्तजित अवस्था(Triplet excited state) में है। प्रति समानांतर स्पिन:- S1=+1/2 और S2=-1/2 S1+S2=+1/2-1/2=0 (2S+1)=2×0+1=1 अणु की स्पिन बहुलता एक है अर्थात् अणु एकक उत्तेजित अवस्था(singlet excited state) में है। द्विपरमाण्विक अणु ऊर्जा की उपयुक्त मात्रा का अवशोषण करके किसी भी उच्च इलेक्ट्रॉनिक अवस्था में जा सकता है। अतः अणु की कई एकक उत्तेजित अवस्थाएं हो सकती है। इन्हें प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि एकक अवस्थाएं कहते हैं तथा S1,S2,S3...... आदि से दर्शाते है। इसी प्रकार अणु की कई तरीका अवस्थाएं होती है जिन्हें T1,T2,T3..... आदि से दर्शाते हैं। त्रिक अवस्था में ऊर्जा एकक अवस्था से कम होती है। अर्थात् Es1>Et1,Es2>Et2,Es3>Et3 आदि ।
उपयुक्त विकिरण के फोटॉन के अवशोषण से अणु के इलेक्ट्रॉन का संक्रमण एकक मूल अवस्था S0 से S1,S2,S3 आदि पर हो सकता है। प्रत्येक संक्रमण के लिए प्रकाश ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा का अवशोषण होता है। एकक उत्तेजित अवस्थाओं (S1,S2,S3 आदि) के नीचे इनकी संगत त्रिक उत्तेजित अवस्थाएं (T1,T2,T3 आदि) होती है। इस चित्र में प्राथमिक प्रक्रम में सक्रिय अणु का बनना तथा उसमें होने वाली प्राथमिक घटनाओं को दर्शाया गया है। अणु एकक उत्तेजित अवस्था या त्रिक उत्तेजित अवस्था में (दोनों स्थितियों में) सक्रियित अणु कहलाता है।
अणु की अपनी मूल अवस्था से उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा अवस्थाओं (S3,S2 या T3,T2) पहुंचने पर प्रकाश रसायनिक अभिक्रिया होने या कोई प्रतिदीप्ति उत्पन्न करने के पहले ही एक के बाद एक तीव्र गति से कुछ घटनाएं हो सकती है जिनमें अणु अपनी अतिरिक्त ऊर्जा खो देता है। इन घटनाओं को विकिरण रहित या अविकिरणात्मक संक्रमण कहते हैं। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/Ls72oX3KsZE By Manjit sahu
क्वांटम दक्षता:- क्वांटम दक्षता द्वारा अवशोषित प्रकाश के प्रत्येक क्वांटम द्वारा अपघटित होने वाले अणुओं का बोध होता है। इसे 'फाई' से प्रदर्शित किया जाता है। क्वांटम दक्षता(फाई)= दिए गए समय में अपघटित अणुओं की संख्या / उसी समय में अवशोषित क्वांटमों की संख्या फाई= दिये गए समय में अपघटित मोलों की संख्या / उसी समय में अवशोषित आइंस्टीनों की संख्या उच्च तथा निम्न क्वांटम दक्षता के कारण:- उच्च तथा निम्न क्वांटम दक्षता का स्पष्टीकरण बोडेन्स्टाइन ने दिया। इसके अनुसार प्रकाश रासायनिक अभिक्रियाएं दो विभिन्न प्रक्रमोों में पूर्ण होती हैं-- (१)प्राथमिक प्रकम, (२)द्वितीयक प्रक्रम। (१) प्राथमिक प्रक्रम:- इस प्रक्रम में पदार्थ का प्रत्येक अणु या परमाणु एक फोटॉन विकिरण अवशोषित कर उत्तेजित अणु या परमाणु बन जाता है-- A + hv ----> A* ----> उत्पाद परमाणु क्वांटम उत्तेजित अणु या अणु या परमाणु
दूसरी संभावना यह है कि उत्तेजित अणु अपघटित होकर उत्पाद बना देता है। इन दोनों ही संभावनाओं में फाई का मान अवश्य एक रहता है। (२) द्वितीयक प्रक्रम:- यह प्रक्रम प्राथमिक प्रक्रम से बने उत्तेजित परमाणुओं, अणुओं तथा मुक्त मूलकों से संबंधित है। उच्च क्वांटम दक्षता के निम्नलिखित कारण है-- (१) प्राथमिक प्रक्रम में बने मूलक श्रृंखला अभिक्रिया आरंभ करते हैं, अतः ऐसी स्थिति में फाई का मान श्रृंखला अभिक्रिया के परिमाण पर निर्भर करता है। (२) माध्यमिक उत्पाद बन सकता है जो उत्प्रेरक का कार्य करता है। (३) अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी हो सकती है जिससे उत्सर्जित ऊष्मा अन्य अणुओं को सक्रियित कर देगी तथा वे अणु फोटॉन के अवशोषण के बिना ही अभिक्रिया करने में सक्षम होंगे। (४) सक्रियित अणु अन्य अणुओं से टकराकर उन्हें ऊर्जा का स्थानांतरण कर सकते हैं, जिससे वे अणु भी सक्रियित हो सकते हैं। निम्न क्वांटम दक्षता के निम्नलिखित कारण है--(१)उत्तेजित अणु उत्पाद बनने के पूर्व ही विसक्रियित हो जाते हैं। (२) उत्तेजित अणु के अनुत्तेजित अणुओं से टकराने से उत्तेजित अणु की ऊर्जा कम हो जाती है। (३) प्राथमिक प्रकाश रासायनिक प्रक्रम विपरीत दिशा में हो जाए। (४) विघटित खण्ड पुनः संयोग करके मूल यौगिक बना दे। उदाहरण-- हाइड्रोजन तथा ब्रोमीन का संयोग की क्वांटम दक्षता 0.01 (निम्न) होने का स्पष्टीकरण--- इस अभिक्रिया की क्रियाविधि बोडेन्सटीन तथा लिंडे ने सन् 1925 में दिया। H2 तथा Br2 के प्रकाश रासायनिक संयोग के लिए 5,100A से कम तरंगदैर्ध्य के विकिरण की आवश्यकता होती है। इस अभिक्रिया की क्वांटम दक्षता बहुत कम 0.01 होती है। ब्रोमीन अणु क्वांटम का अवशोषण कर ब्रोमीन परमाणुओं में अपघटित हो जाता है, इस अभिक्रिया की क्रियाविधि निम्नलिखित हैं-- (१) Br2 ➕ hu -----------> Br ➕ Br (प्राथमिक प्रक्रम)
(२) H2 ➕ Br ------------> HBr ➕ H (द्वितीय प्रक्रम) (३) Br2 ➕ H ------------> HBr ➕ Br (द्वितीय प्रक्रम) (४) HBr ➕ H ------------> H2 ➕ Br (द्वितीय प्रक्रम) (५) Br ➕ Br ------------> Br2 (द्वितीय प्रक्रम) अभिक्रिया (२) अत्याधिक ऊष्माशोषी है और साधारण ताप पर बहुत धीमी गति से होती है। अधिकांश ब्रोमीन परमाणु आपस में संयोगकर ब्रोमीन अणु बना लेते हैं। अभिक्रिया (३), (४) तथा (५) जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अभिक्रिया (२) पर निर्भर करती है, वे भी पूर्ण नहीं हो पातीं। इस कारण अभिक्रिया की क्वांटम दक्षता बहुत कम होती है। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/W7hFCDSK6d8 By Manjit sahu
ग्रोथस ड्रेपर का नियम:- इसके अनुसार केवल वही विकिरणें है प्रकाश रसायनिक अभिक्रिया के लिए उत्तरदाई है होते हैं जो क्रिया करने वाले अभिकारक ऑडियो द्वारा अवशोषित होती है यह एक गुणात्मक नियम है जो अवशोषित प्रकाश एवं क्रिया करने वाले ऑडियो के मध्य कोई मात्रात्मक संबंध नहीं दर्शाता है। स्टार्क आइंस्टीन का प्रकाश रसायनिक तुल्यता का नियम:- इस नियम के अनुसार, "प्राथमिक प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेने वाला प्रत्येक अणु एक क्वांटम विकिरण का अवशोषण कर सक्रियित(activate) होता है।"
एक मोल पदार्थ द्वारा अवशोषित ऊर्जा को एक आइंस्टीन कहते हैं।
ऊपर के समीकरणों से स्पष्ट है कि विकिरण का तरंगदैर्ध्य जितना ही कम होगा, प्रति मोल अवशोषित ऊर्जा उतनी ही अधिक होगी। क्योंकि
अतःस्पष्ट है कि प्रति ग्राम अणु अवशोषित ऊर्जा तरंगदैर्ध्य के व्युत्क्रमानुपाती होती है। यदि स्टार्क आइंस्टीन नियम सत्य है तो प्रत्येक मोल पदार्थ
ऊर्जा अवशोषित करेगा, अर्थात 1 kcal ऊर्जा से
मोल पदार्थ का अपघटन होना चाहिए। सत्यापन:- अभिक्रिया प्रकाश रासायनिक तुल्यता का पालन कर रही है या नहीं यह जानने के लिए उस अभिक्रिया के लिए क्वांटम दक्षता का प्रायोगिक निर्धारण किया जाता है। यदि क्वांटम दक्षता का मान एक आता है तो अभिक्रिया इस नियम का पालन करती है। इस लिंक पर जाएं 👇👇👇 https://youtu.be/lHpzrs8J-IA By Manjit sahu
इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में उत्सर्जित विकिरण की आवृत्ति:- किसी अणु की कुल ऊर्जा E का मान मुख्य रूप से उसकी घूर्णन, कम्पन एवं इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा का योग होती है, अतः
जब अणु उपयुक्त तरंगदैर्ध्य की विद्युत चुंबकीय विकिरण अवशोषित कर उत्तेजित अवस्था में जाता है तो उसकी कुल ऊर्जा E' निम्न प्रकार होगी--
इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में ऊर्जा परिवर्तन ∆E का मान निम्नानुसार होगी
अतः इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में अवशोषित होने वाली विकरण की आवृत्ति
से ज्ञात की जा सकती है। विभिन्न प्रकार के ऊर्जा संक्रमण या इलेक्ट्रॉनिक अवशोषण बैण्डों की उत्पत्ति(origin of electronic observation bands):- कार्बनिक यौगिकों के अणुओं में सिग्मा, पाई और एन आर्बिटलों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों में से कुछ का संक्रमण मूल स्थिति से उत्तेजित स्थिति में हो जाता है। जब संयोजकता इलेक्ट्रॉनों का इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा स्तरों में संक्रमण होता है तो पराबैगनी क्षेत्र में स्पेक्ट्रा प्राप्त होते हैं। ये संयोजकता इलेक्ट्रॉन परमाणुओं के परमाण्विक आर्बिटलों में रहते हैं। अणु बनने पर संयोजकता इलेक्ट्रॉन जो बंध बनाते हैं बंधक कक्षकों में रहते हैं। सिग्मा बंध बनाने वाले इलेक्ट्रॉनों को सिग्मा इलेक्ट्रॉन तथा पाई बंध बनाने वाले इलेक्ट्रॉनों को पाई इलेक्ट्राॅन कहते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ कक्षक बंध के बनाने में काम नहीं आते जिन्हें अनाबंधी कक्षक कहते हैं। उपर्युक्त आर्बिटलों के अतिरिक्त विपरीत बंधी आर्बिटल भी होते हैं जो ऊर्जा वाले होते हैं। सिग्मा तथा पाई बंधों से संबंधित विपरीत बंधी आर्बिटलों को सिग्मा स्टार तथा पाई स्टार आर्बिटल कहते हैं। एन इलेक्ट्रॉन बंधन में भाग नहीं लेते अतः उनसे संबंधित कोई विपरीत बंधी आर्बिटल नहीं होते। जब एक अणु पराबैंगनी तथा दृश्य क्षेत्रों में अवशोषण करता है तो इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा स्तरों में चित्र में दर्शाए अनुसार निम्नलिखित संक्रमण होते हैं--
इस प्रकार के संक्रमण के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है अतः ऐसे यौगिक पराबैगनी क्षेत्र में अवशोषण नहीं करते जिनके संयोजकता कोश के सभी इलेक्ट्रॉन एकल बंध में प्रयुक्त हो रहे हैं। संतृप्त हाइड्रोकार्बन इसी प्रकार के यौगिक है तथा ये पराबैंगनी विकिरण के लिए पारदर्शी होते हैं।
पहले प्रकार के संक्रमण की तुलना में इस संक्रमण में कम ऊर्जा लगती है। ऐसे यौगिक जिनमें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर या हैलोजन होते हैं (C=O,C=S,N=O,N=N) जिनमें अनाबंधी इलेक्ट्रॉन होते हैं, इस प्रकार का संक्रमण दर्शाते हैं। मेथिल एल्कोहॉल और मेथिल क्लोराइड जैसे यौगिक पराबैंगनी विकिरण का अवशोषण करते हैं।
इस संक्रमण के लिए अपेक्षाकृत और कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। संतृप्त एल्डिहाइड और कीटोन जब निम्न तीव्रता के प्रकाश का अवशोषण करते हैं तो उनमें से इस प्रकार के संक्रमण होते हैं।
इस प्रकार के संक्रमण के लिए संक्रमण के लिए (3) तथा (2) संक्रमणों के लिए आवश्यक ऊर्जाओं के बीच की ऊर्जा की आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ-- सिग्मा➖ सिग्मा स्टार संक्रमण, एल्कीन, एल्काइन, कार्बोनेल एवं एजो यौगिको में होता है।CH2=CH2 में पाई ➖ पाई स्टार संक्रमण पाया जाता है। कार्बनिक यौगिकों में पाई ➖ पाई स्टार संक्रमण से दो प्रकार के बैंड उत्पन्न होते हैं- (१) K बैण्ड (K-band) वे कार्बनिक यौगिक जिनमें द्विबंधो का संयुग्मित तंत्र होता है उनमें बैंड होते हैं तथा संयुग्मन के कारण बैंड का लंबे तरंगदैर्ध्य की तरफ विस्थापन होता है जिसमें उसकी तीव्रता बढ़ जाती है। संयुग्मन के विस्तार के कारण लंबे तरंगदैर्ध्य की तरफ नियमित विस्थापन होता है जैसा सारणी में दर्शाया गया है।
(२) B बैण्ड(B-bond)बेंजीन में एक चौड़ा बैंड लेमडा उच्चतम के 254 माइक्रोमीटर पर प्राप्त होता है। इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण के साथ कम्पन ऊर्जा स्तरों के द्वारा इसकी सूक्ष्म संरचना होती है। यदि बेंजीन रिंग में एक क्रोमोफोर उपस्थित है तो अधिक तीव्र K बैंड की तुलना में B बैंड अधिक लंबे तरंगदैर्ध्य पर प्राप्त होता है।
इसमें इलेक्ट्रॉन आबंधी कक्षक सिग्मा से विपरीत बंधी कक्षक पाई स्टार में स्थानांतरित यहां सिग्मा ➖ सिग्मा स्टार की तुलना में कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऐसा संक्रमण संतृप्त एवं कार्बोनिल यौगिकों में पाया जाता है। विभिन्न प्रकार के संक्रमण के लिए आवश्यक ऊर्जा के आधार क्रम निम्नानुसार होगी होगा--
एल्केनों में---- कार्बोनिल यौगिकों में---- ऐल्कीन, ऐल्काइन, कार्बोनिल एवं एजो यौगिक में---- ऑक्सीजन, सल्फर, नाइट्रोजन एवं हैलोजन युक्त यौगिकों में---- कार्बोनिक यौगिकों में---- विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉन संक्रमणों के आवश्यक ऊर्जा का बढ़ता क्रम
ऊष्मीय अभिक्रियाएं (Thermal Reaction) या अप्रकाशिक अभिक्रियाएं (dark reaction):- वे अभिक्रिया जो ऊष्मा से प्रभावित या प्रेरित होते हैं, ऊष्मीय अभिक्रिया कहलाते हैं। जैसे:-
अभिक्रिया (१) और (४) ताप घटाने से तथा अभिक्रिया (२) और (३) ताप बढ़ाने से अग्र दिशा में रअग्रसित होती है। प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया (photochemical reaction):- वे अभिक्रियाएं जो दृश्य प्रकाश या किसी अन्य विद्युत चुंबकीय विकिरणों द्वारा प्रभावित या प्रेरित होती हैं, प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया कहलाती है। जैसे:-
ऊष्मा एवं प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया में अंतर ऊष्मीय अभिक्रिया:- (१) इनके ताप गुणांक उच्च होते हैं। (२) ये अभिक्रियाएं ताप पर निर्भर होती है। (३) इन अभिक्रियाओं में मुक्त ऊर्जा में कमी होती है। प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया:- (१) इनके ताप गुणांक कम होते हैं। (२) ये अभिक्रियाएं केवल विद्युत चुंबकीय विकिरणों पर निर्भर होती हैं। (३) कुछ अभिक्रियाओं को छोड़कर अधिकांश प्रकाश रासायनिक अभिक्रियाओं है में मुक्त ऊर्जा में वृद्धि होती है। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/AQ-s4dFH4Kc
फ्रैंक काॅणडान सिद्धांत:- इस सिद्धांत के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण निम्नतम कम्पन ऊर्जा से ही होता है, क्योंकि इन निम्नतम कंम्पन ऊर्जा स्तरों पर परमाणुओं का वेग (कम्पन ऊर्जा) शून्य होती है। इस कारण परमाणु इस स्थिति में सबसे ज्यादा समय बिताते हैं (चित्र के अनुसार aa' कम्पन ऊर्जा स्तर से इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण होंगे) अणु को ऊर्जा देने पर नाभिकों के दोलन के पूर्व ही इलेक्ट्रॉनों का संक्रमण हो जाता है, चूंकि इलेक्ट्रॉनों का वेग नाभिकों के वेग से ज्यादा होता है, अतः नाभिकों के दोलन करके अंतरनाभिकीय दूरी को परिवर्तित करने से पहले ही इलेक्ट्रॉनों का संक्रमण हो जाता है। चित्र में aa' से c में होने वाला संक्रमण इसी सिद्धांत पर आधारित है, जिससे इलेक्ट्रॉन वक्र (A) के निम्निष्ठ से वक्र (B) के निम्निष्ठ में न जाकर aa' से c में पहुंच जाते हैं।
फ्रेंक कॉण्डान सिद्धांत के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण की सर्वाधिक संभावना मूल इलेक्ट्रॉनिक अवस्था के मूल कम्पन ऊर्जा स्तर (v=0) के मध्य बिंदु से (न कि मूल कम्पन ऊर्जा के दोनों सिरों से) पहली उत्तेजित इलेक्ट्रॉनिक अवस्था के v=2 कम्पन ऊर्जा स्तर पर होती है। अतः v=0 से v=2 में होने वाला संक्रमण तीव्र बैण्ड उत्पन्न करेगा जबकि v=0 से v=3,4,5 पर संक्रमण की प्रायिकताएं इनकम होती है। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/AQ-s4dFH4Kc By Manjit sahu
(c) घूर्णन स्पेक्ट्रम पर समस्थानिक प्रभाव(isotope effect on rotational spectrum) किसी तत्व के परमाणु जिनके परमाणु क्रमांक तो समान होते हैं किंतु उनके भार भिन्न-भिन्न होते हैं, उन्हें समस्थानिक कहते हैं। जब किसी अणु में किसी एक परमाणु को उसके समस्थानिक द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है तो बनने वाला नया अणु रासायनिक तौर पर तो पहले अणु के समान होता है, किंतु समस्थानिक से प्रतिस्थापन करने पर अणु का द्रव्यमान परिवर्तित हो जाता है जिससे अणु का जड़त्व आघूर्ण (I) में भी परिवर्तन होता है। चूंकि घूर्णन स्पेक्ट्रम में घूर्णन कारक
होता है। यदि प्रतिस्थापन करने वाले परमाणु का द्रव्यमान अधिक हो, तो इससे I का मान भी बढ़ेगा एवं B का मान कम हो जाएगा। चूंकि घूर्णन स्तर की ऊर्जा या तरंग संख्या B के मान के समानुपाती होती है।
अतः B का मान कम होने से घूर्णन स्पेक्ट्रम रेखाएं पास पास आ जाएगी। उदाहरणार्थ CO अणु में C12 परमाणु को उसके समस्थानिक C13 परमाणु से प्रतिस्थापित करने पर CO के घूर्णन स्पेक्ट्रम रेखाओं के बीच की दूरियां कम हो जाती है।
समस्थानिक प्रतिस्थापन के अनुप्रयोग(application of isotopic substitution) समस्थानिक प्रतिस्थापन कर घूर्णन स्पेक्ट्रम की सहायता से समस्थानिक का परमाणु भार ज्ञात किया जा सकता है। एक तत्व जिसके दो समस्थानिकों का द्रव्यमान m1 एवं m2 है, जिनसे बने अणुओं का जड़त्व आघूर्ण I1 एवं I2 तथा घूर्णन इससे स्थिरांक व अपचयित द्रव्यमान क्रमशः
समस्थानिक प्रतिस्थापन से अणु के अंतरनाभिकीय दूरी में या अणु की बंध लंबाई में कोई ज्यादा अंतर नहीं आता है।
इस तरह
की सहायता से अज्ञात समस्थानिक का परमाणु द्रव्यमान ज्ञात किया जा सकता है। (d)घूर्णन स्पेक्ट्रम के लिए आवश्यक शर्तें (१) घूर्णन स्पेक्ट्रम विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम के उस भाग से संबंध रखता है, जो 100 माइक्रोमीटर से 1 सेंटीमीटर के परास में है। अतः यह सुदूर अवरक्त और रेडियों आवृत्ति क्षेत्र के मध्य के क्षेत्र में बनता है। अतः घूर्णन स्पेक्ट्रम के लिए आवश्यक विद्युत चुंबकीय क्षेत्र की आवश्यकता है। (२)घूर्णन स्पेक्ट्रम केवल उन्हीं अणुओं में सक्रिय हो पाता है। जिनमें स्थाई द्विध्रुव आघूर्ण होता है। जैसे H2O,CO,HCl,CHCl3 इत्यादि में जबकि H2,N2,O2,Cl2 शुद्ध घूर्णन स्पेक्ट्रम नहीं प्रदर्शित करते, क्योंकि इनमें स्थाई द्विध्रुव आघूर्ण नहीं है। अनुप्रयोग (१) द्विपरमाणुवीय अणु के मध्य बंध की दूरी ज्ञात करने में-- घूर्णन करते हैं द्विपरमाणुक अणु की ऊर्जा
जहां, J का मान 0,1,2,3...... इत्यादि हो सकता है। J=घूर्णन क्वांटम संख्या, h= प्लांक स्थिरांक एवं I= जड़त्व आघूर्ण है। समीकरण (1) को तरंग संख्या के रूप में परिवर्तित करने पर,
जहां घूर्णन नियतांक है वरण सिद्धांत के अनुसार➖∆J=+-1 होता है। समीकरण (2) में J का मान रखने पर न्यूनतम ऊर्जा अंतर होगा।
m1 तथा m2 दो परमाणुओं के द्रव्यमान हैं तथा r उनके बीच की दूरी है, जिसे बंध लंबाई कहा जाता है।