रविवार, 31 मई 2020

इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में उत्सर्जित विकिरण की आवृत्ति


इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में उत्सर्जित विकिरण की आवृत्ति:-
किसी अणु की कुल ऊर्जा E का मान मुख्य रूप से उसकी घूर्णन, कम्पन एवं इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा का योग होती है, अतः

जब अणु उपयुक्त तरंगदैर्ध्य की विद्युत चुंबकीय विकिरण अवशोषित कर उत्तेजित अवस्था में जाता है तो उसकी कुल ऊर्जा E' निम्न प्रकार होगी--

इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में ऊर्जा परिवर्तन ∆E का मान निम्नानुसार होगी

अतः इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में अवशोषित होने वाली विकरण की आवृत्ति

से ज्ञात की जा सकती है।

विभिन्न प्रकार के ऊर्जा संक्रमण या इलेक्ट्रॉनिक अवशोषण बैण्डों की उत्पत्ति(origin of electronic observation bands):-
कार्बनिक यौगिकों के अणुओं में सिग्मा, पाई और एन आर्बिटलों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों में से कुछ का संक्रमण मूल स्थिति से उत्तेजित स्थिति में हो जाता है। जब संयोजकता इलेक्ट्रॉनों का इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा स्तरों में संक्रमण होता है तो पराबैगनी क्षेत्र में स्पेक्ट्रा प्राप्त होते हैं। ये संयोजकता इलेक्ट्रॉन परमाणुओं के परमाण्विक आर्बिटलों में रहते हैं। अणु बनने पर संयोजकता इलेक्ट्रॉन जो बंध बनाते हैं बंधक कक्षकों में रहते हैं। सिग्मा बंध बनाने वाले इलेक्ट्रॉनों को सिग्मा इलेक्ट्रॉन तथा पाई बंध बनाने वाले इलेक्ट्रॉनों को पाई इलेक्ट्राॅन कहते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ कक्षक बंध के बनाने में काम नहीं आते जिन्हें अनाबंधी कक्षक कहते हैं। उपर्युक्त आर्बिटलों के अतिरिक्त विपरीत बंधी आर्बिटल भी होते हैं जो ऊर्जा वाले होते हैं। सिग्मा तथा पाई बंधों से संबंधित विपरीत बंधी आर्बिटलों को सिग्मा स्टार तथा पाई स्टार आर्बिटल कहते हैं। एन इलेक्ट्रॉन बंधन में भाग नहीं लेते अतः उनसे संबंधित कोई विपरीत बंधी आर्बिटल नहीं होते।
 जब एक अणु पराबैंगनी तथा दृश्य क्षेत्रों में अवशोषण करता है तो इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा स्तरों में चित्र में दर्शाए अनुसार निम्नलिखित संक्रमण होते हैं--


इस प्रकार के संक्रमण के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है अतः ऐसे यौगिक पराबैगनी क्षेत्र में अवशोषण नहीं करते जिनके संयोजकता कोश के सभी इलेक्ट्रॉन एकल बंध में प्रयुक्त हो रहे हैं। संतृप्त हाइड्रोकार्बन इसी प्रकार के यौगिक है तथा ये पराबैंगनी विकिरण के लिए पारदर्शी होते हैं।

पहले प्रकार के संक्रमण की तुलना में इस संक्रमण में कम ऊर्जा लगती है। ऐसे यौगिक जिनमें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर या हैलोजन होते हैं (C=O,C=S,N=O,N=N) जिनमें अनाबंधी इलेक्ट्रॉन होते हैं, इस प्रकार का संक्रमण दर्शाते हैं। मेथिल एल्कोहॉल और मेथिल क्लोराइड जैसे यौगिक पराबैंगनी विकिरण का अवशोषण करते हैं।

इस संक्रमण के लिए अपेक्षाकृत और कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। संतृप्त एल्डिहाइड और कीटोन जब निम्न तीव्रता के प्रकाश का अवशोषण करते हैं तो उनमें से इस प्रकार के संक्रमण होते हैं।

इस प्रकार के संक्रमण के लिए संक्रमण के लिए (3) तथा (2) संक्रमणों के लिए आवश्यक ऊर्जाओं के बीच की ऊर्जा की आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ-- सिग्मा➖ सिग्मा स्टार संक्रमण, एल्कीन, एल्काइन, कार्बोनेल एवं एजो यौगिको में होता है।CH2=CH2 में पाई ➖ पाई स्टार संक्रमण पाया जाता है। कार्बनिक यौगिकों में पाई ➖ पाई स्टार संक्रमण से दो प्रकार के बैंड उत्पन्न होते हैं-
(१) K बैण्ड (K-band)
वे कार्बनिक यौगिक जिनमें द्विबंधो का संयुग्मित तंत्र होता है उनमें बैंड होते हैं तथा संयुग्मन के कारण बैंड का लंबे तरंगदैर्ध्य की तरफ विस्थापन होता है जिसमें उसकी तीव्रता बढ़ जाती है। संयुग्मन के विस्तार के कारण लंबे तरंगदैर्ध्य की तरफ नियमित विस्थापन होता है जैसा सारणी में दर्शाया गया है।

(२) B बैण्ड(B-bond) बेंजीन में एक चौड़ा बैंड लेमडा उच्चतम के 254 माइक्रोमीटर पर प्राप्त होता है। इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण के साथ कम्पन ऊर्जा स्तरों के द्वारा इसकी सूक्ष्म संरचना होती है। यदि बेंजीन रिंग में एक क्रोमोफोर उपस्थित है तो अधिक तीव्र K बैंड की तुलना में B बैंड अधिक लंबे तरंगदैर्ध्य पर प्राप्त होता है।

इसमें इलेक्ट्रॉन आबंधी कक्षक सिग्मा से विपरीत बंधी कक्षक पाई स्टार में स्थानांतरित यहां सिग्मा ➖ सिग्मा स्टार की तुलना में कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऐसा संक्रमण संतृप्त एवं कार्बोनिल यौगिकों में पाया जाता है।
   विभिन्न प्रकार के संक्रमण के लिए आवश्यक ऊर्जा के आधार क्रम निम्नानुसार होगी होगा--
एल्केनों में----
कार्बोनिल यौगिकों में----
ऐल्कीन, ऐल्काइन, कार्बोनिल एवं एजो यौगिक में----
ऑक्सीजन, सल्फर, नाइट्रोजन एवं हैलोजन युक्त यौगिकों में----
कार्बोनिक यौगिकों में----

विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉन संक्रमणों के आवश्यक ऊर्जा का बढ़ता क्रम


इस लिंक पर जाए 👇👇👇
https://youtu.be/8MWFQqd1UrI

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