क्वांटम दक्षता:- क्वांटम दक्षता द्वारा अवशोषित प्रकाश के प्रत्येक क्वांटम द्वारा अपघटित होने वाले अणुओं का बोध होता है। इसे 'फाई' से प्रदर्शित किया जाता है। क्वांटम दक्षता(फाई)= दिए गए समय में अपघटित अणुओं की संख्या / उसी समय में अवशोषित क्वांटमों की संख्या फाई= दिये गए समय में अपघटित मोलों की संख्या / उसी समय में अवशोषित आइंस्टीनों की संख्या उच्च तथा निम्न क्वांटम दक्षता के कारण:- उच्च तथा निम्न क्वांटम दक्षता का स्पष्टीकरण बोडेन्स्टाइन ने दिया। इसके अनुसार प्रकाश रासायनिक अभिक्रियाएं दो विभिन्न प्रक्रमोों में पूर्ण होती हैं-- (१)प्राथमिक प्रकम, (२)द्वितीयक प्रक्रम। (१) प्राथमिक प्रक्रम:- इस प्रक्रम में पदार्थ का प्रत्येक अणु या परमाणु एक फोटॉन विकिरण अवशोषित कर उत्तेजित अणु या परमाणु बन जाता है-- A + hv ----> A* ----> उत्पाद परमाणु क्वांटम उत्तेजित अणु या अणु या परमाणु
दूसरी संभावना यह है कि उत्तेजित अणु अपघटित होकर उत्पाद बना देता है। इन दोनों ही संभावनाओं में फाई का मान अवश्य एक रहता है। (२) द्वितीयक प्रक्रम:- यह प्रक्रम प्राथमिक प्रक्रम से बने उत्तेजित परमाणुओं, अणुओं तथा मुक्त मूलकों से संबंधित है। उच्च क्वांटम दक्षता के निम्नलिखित कारण है-- (१) प्राथमिक प्रक्रम में बने मूलक श्रृंखला अभिक्रिया आरंभ करते हैं, अतः ऐसी स्थिति में फाई का मान श्रृंखला अभिक्रिया के परिमाण पर निर्भर करता है। (२) माध्यमिक उत्पाद बन सकता है जो उत्प्रेरक का कार्य करता है। (३) अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी हो सकती है जिससे उत्सर्जित ऊष्मा अन्य अणुओं को सक्रियित कर देगी तथा वे अणु फोटॉन के अवशोषण के बिना ही अभिक्रिया करने में सक्षम होंगे। (४) सक्रियित अणु अन्य अणुओं से टकराकर उन्हें ऊर्जा का स्थानांतरण कर सकते हैं, जिससे वे अणु भी सक्रियित हो सकते हैं। निम्न क्वांटम दक्षता के निम्नलिखित कारण है--(१)उत्तेजित अणु उत्पाद बनने के पूर्व ही विसक्रियित हो जाते हैं। (२) उत्तेजित अणु के अनुत्तेजित अणुओं से टकराने से उत्तेजित अणु की ऊर्जा कम हो जाती है। (३) प्राथमिक प्रकाश रासायनिक प्रक्रम विपरीत दिशा में हो जाए। (४) विघटित खण्ड पुनः संयोग करके मूल यौगिक बना दे। उदाहरण-- हाइड्रोजन तथा ब्रोमीन का संयोग की क्वांटम दक्षता 0.01 (निम्न) होने का स्पष्टीकरण--- इस अभिक्रिया की क्रियाविधि बोडेन्सटीन तथा लिंडे ने सन् 1925 में दिया। H2 तथा Br2 के प्रकाश रासायनिक संयोग के लिए 5,100A से कम तरंगदैर्ध्य के विकिरण की आवश्यकता होती है। इस अभिक्रिया की क्वांटम दक्षता बहुत कम 0.01 होती है। ब्रोमीन अणु क्वांटम का अवशोषण कर ब्रोमीन परमाणुओं में अपघटित हो जाता है, इस अभिक्रिया की क्रियाविधि निम्नलिखित हैं-- (१) Br2 ➕ hu -----------> Br ➕ Br (प्राथमिक प्रक्रम)
(२) H2 ➕ Br ------------> HBr ➕ H (द्वितीय प्रक्रम) (३) Br2 ➕ H ------------> HBr ➕ Br (द्वितीय प्रक्रम) (४) HBr ➕ H ------------> H2 ➕ Br (द्वितीय प्रक्रम) (५) Br ➕ Br ------------> Br2 (द्वितीय प्रक्रम) अभिक्रिया (२) अत्याधिक ऊष्माशोषी है और साधारण ताप पर बहुत धीमी गति से होती है। अधिकांश ब्रोमीन परमाणु आपस में संयोगकर ब्रोमीन अणु बना लेते हैं। अभिक्रिया (३), (४) तथा (५) जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अभिक्रिया (२) पर निर्भर करती है, वे भी पूर्ण नहीं हो पातीं। इस कारण अभिक्रिया की क्वांटम दक्षता बहुत कम होती है। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/W7hFCDSK6d8 By Manjit sahu
ग्रोथस ड्रेपर का नियम:- इसके अनुसार केवल वही विकिरणें है प्रकाश रसायनिक अभिक्रिया के लिए उत्तरदाई है होते हैं जो क्रिया करने वाले अभिकारक ऑडियो द्वारा अवशोषित होती है यह एक गुणात्मक नियम है जो अवशोषित प्रकाश एवं क्रिया करने वाले ऑडियो के मध्य कोई मात्रात्मक संबंध नहीं दर्शाता है। स्टार्क आइंस्टीन का प्रकाश रसायनिक तुल्यता का नियम:- इस नियम के अनुसार, "प्राथमिक प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेने वाला प्रत्येक अणु एक क्वांटम विकिरण का अवशोषण कर सक्रियित(activate) होता है।"
एक मोल पदार्थ द्वारा अवशोषित ऊर्जा को एक आइंस्टीन कहते हैं।
ऊपर के समीकरणों से स्पष्ट है कि विकिरण का तरंगदैर्ध्य जितना ही कम होगा, प्रति मोल अवशोषित ऊर्जा उतनी ही अधिक होगी। क्योंकि
अतःस्पष्ट है कि प्रति ग्राम अणु अवशोषित ऊर्जा तरंगदैर्ध्य के व्युत्क्रमानुपाती होती है। यदि स्टार्क आइंस्टीन नियम सत्य है तो प्रत्येक मोल पदार्थ
ऊर्जा अवशोषित करेगा, अर्थात 1 kcal ऊर्जा से
मोल पदार्थ का अपघटन होना चाहिए। सत्यापन:- अभिक्रिया प्रकाश रासायनिक तुल्यता का पालन कर रही है या नहीं यह जानने के लिए उस अभिक्रिया के लिए क्वांटम दक्षता का प्रायोगिक निर्धारण किया जाता है। यदि क्वांटम दक्षता का मान एक आता है तो अभिक्रिया इस नियम का पालन करती है। इस लिंक पर जाएं 👇👇👇 https://youtu.be/lHpzrs8J-IA By Manjit sahu
इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में उत्सर्जित विकिरण की आवृत्ति:- किसी अणु की कुल ऊर्जा E का मान मुख्य रूप से उसकी घूर्णन, कम्पन एवं इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा का योग होती है, अतः
जब अणु उपयुक्त तरंगदैर्ध्य की विद्युत चुंबकीय विकिरण अवशोषित कर उत्तेजित अवस्था में जाता है तो उसकी कुल ऊर्जा E' निम्न प्रकार होगी--
इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में ऊर्जा परिवर्तन ∆E का मान निम्नानुसार होगी
अतः इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में अवशोषित होने वाली विकरण की आवृत्ति
से ज्ञात की जा सकती है। विभिन्न प्रकार के ऊर्जा संक्रमण या इलेक्ट्रॉनिक अवशोषण बैण्डों की उत्पत्ति(origin of electronic observation bands):- कार्बनिक यौगिकों के अणुओं में सिग्मा, पाई और एन आर्बिटलों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों में से कुछ का संक्रमण मूल स्थिति से उत्तेजित स्थिति में हो जाता है। जब संयोजकता इलेक्ट्रॉनों का इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा स्तरों में संक्रमण होता है तो पराबैगनी क्षेत्र में स्पेक्ट्रा प्राप्त होते हैं। ये संयोजकता इलेक्ट्रॉन परमाणुओं के परमाण्विक आर्बिटलों में रहते हैं। अणु बनने पर संयोजकता इलेक्ट्रॉन जो बंध बनाते हैं बंधक कक्षकों में रहते हैं। सिग्मा बंध बनाने वाले इलेक्ट्रॉनों को सिग्मा इलेक्ट्रॉन तथा पाई बंध बनाने वाले इलेक्ट्रॉनों को पाई इलेक्ट्राॅन कहते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ कक्षक बंध के बनाने में काम नहीं आते जिन्हें अनाबंधी कक्षक कहते हैं। उपर्युक्त आर्बिटलों के अतिरिक्त विपरीत बंधी आर्बिटल भी होते हैं जो ऊर्जा वाले होते हैं। सिग्मा तथा पाई बंधों से संबंधित विपरीत बंधी आर्बिटलों को सिग्मा स्टार तथा पाई स्टार आर्बिटल कहते हैं। एन इलेक्ट्रॉन बंधन में भाग नहीं लेते अतः उनसे संबंधित कोई विपरीत बंधी आर्बिटल नहीं होते। जब एक अणु पराबैंगनी तथा दृश्य क्षेत्रों में अवशोषण करता है तो इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा स्तरों में चित्र में दर्शाए अनुसार निम्नलिखित संक्रमण होते हैं--
इस प्रकार के संक्रमण के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है अतः ऐसे यौगिक पराबैगनी क्षेत्र में अवशोषण नहीं करते जिनके संयोजकता कोश के सभी इलेक्ट्रॉन एकल बंध में प्रयुक्त हो रहे हैं। संतृप्त हाइड्रोकार्बन इसी प्रकार के यौगिक है तथा ये पराबैंगनी विकिरण के लिए पारदर्शी होते हैं।
पहले प्रकार के संक्रमण की तुलना में इस संक्रमण में कम ऊर्जा लगती है। ऐसे यौगिक जिनमें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर या हैलोजन होते हैं (C=O,C=S,N=O,N=N) जिनमें अनाबंधी इलेक्ट्रॉन होते हैं, इस प्रकार का संक्रमण दर्शाते हैं। मेथिल एल्कोहॉल और मेथिल क्लोराइड जैसे यौगिक पराबैंगनी विकिरण का अवशोषण करते हैं।
इस संक्रमण के लिए अपेक्षाकृत और कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। संतृप्त एल्डिहाइड और कीटोन जब निम्न तीव्रता के प्रकाश का अवशोषण करते हैं तो उनमें से इस प्रकार के संक्रमण होते हैं।
इस प्रकार के संक्रमण के लिए संक्रमण के लिए (3) तथा (2) संक्रमणों के लिए आवश्यक ऊर्जाओं के बीच की ऊर्जा की आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ-- सिग्मा➖ सिग्मा स्टार संक्रमण, एल्कीन, एल्काइन, कार्बोनेल एवं एजो यौगिको में होता है।CH2=CH2 में पाई ➖ पाई स्टार संक्रमण पाया जाता है। कार्बनिक यौगिकों में पाई ➖ पाई स्टार संक्रमण से दो प्रकार के बैंड उत्पन्न होते हैं- (१) K बैण्ड (K-band) वे कार्बनिक यौगिक जिनमें द्विबंधो का संयुग्मित तंत्र होता है उनमें बैंड होते हैं तथा संयुग्मन के कारण बैंड का लंबे तरंगदैर्ध्य की तरफ विस्थापन होता है जिसमें उसकी तीव्रता बढ़ जाती है। संयुग्मन के विस्तार के कारण लंबे तरंगदैर्ध्य की तरफ नियमित विस्थापन होता है जैसा सारणी में दर्शाया गया है।
(२) B बैण्ड(B-bond)बेंजीन में एक चौड़ा बैंड लेमडा उच्चतम के 254 माइक्रोमीटर पर प्राप्त होता है। इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण के साथ कम्पन ऊर्जा स्तरों के द्वारा इसकी सूक्ष्म संरचना होती है। यदि बेंजीन रिंग में एक क्रोमोफोर उपस्थित है तो अधिक तीव्र K बैंड की तुलना में B बैंड अधिक लंबे तरंगदैर्ध्य पर प्राप्त होता है।
इसमें इलेक्ट्रॉन आबंधी कक्षक सिग्मा से विपरीत बंधी कक्षक पाई स्टार में स्थानांतरित यहां सिग्मा ➖ सिग्मा स्टार की तुलना में कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऐसा संक्रमण संतृप्त एवं कार्बोनिल यौगिकों में पाया जाता है। विभिन्न प्रकार के संक्रमण के लिए आवश्यक ऊर्जा के आधार क्रम निम्नानुसार होगी होगा--
एल्केनों में---- कार्बोनिल यौगिकों में---- ऐल्कीन, ऐल्काइन, कार्बोनिल एवं एजो यौगिक में---- ऑक्सीजन, सल्फर, नाइट्रोजन एवं हैलोजन युक्त यौगिकों में---- कार्बोनिक यौगिकों में---- विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉन संक्रमणों के आवश्यक ऊर्जा का बढ़ता क्रम
ऊष्मीय अभिक्रियाएं (Thermal Reaction) या अप्रकाशिक अभिक्रियाएं (dark reaction):- वे अभिक्रिया जो ऊष्मा से प्रभावित या प्रेरित होते हैं, ऊष्मीय अभिक्रिया कहलाते हैं। जैसे:-
अभिक्रिया (१) और (४) ताप घटाने से तथा अभिक्रिया (२) और (३) ताप बढ़ाने से अग्र दिशा में रअग्रसित होती है। प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया (photochemical reaction):- वे अभिक्रियाएं जो दृश्य प्रकाश या किसी अन्य विद्युत चुंबकीय विकिरणों द्वारा प्रभावित या प्रेरित होती हैं, प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया कहलाती है। जैसे:-
ऊष्मा एवं प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया में अंतर ऊष्मीय अभिक्रिया:- (१) इनके ताप गुणांक उच्च होते हैं। (२) ये अभिक्रियाएं ताप पर निर्भर होती है। (३) इन अभिक्रियाओं में मुक्त ऊर्जा में कमी होती है। प्रकाश रासायनिक अभिक्रिया:- (१) इनके ताप गुणांक कम होते हैं। (२) ये अभिक्रियाएं केवल विद्युत चुंबकीय विकिरणों पर निर्भर होती हैं। (३) कुछ अभिक्रियाओं को छोड़कर अधिकांश प्रकाश रासायनिक अभिक्रियाओं है में मुक्त ऊर्जा में वृद्धि होती है। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/AQ-s4dFH4Kc
फ्रैंक काॅणडान सिद्धांत:- इस सिद्धांत के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण निम्नतम कम्पन ऊर्जा से ही होता है, क्योंकि इन निम्नतम कंम्पन ऊर्जा स्तरों पर परमाणुओं का वेग (कम्पन ऊर्जा) शून्य होती है। इस कारण परमाणु इस स्थिति में सबसे ज्यादा समय बिताते हैं (चित्र के अनुसार aa' कम्पन ऊर्जा स्तर से इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण होंगे) अणु को ऊर्जा देने पर नाभिकों के दोलन के पूर्व ही इलेक्ट्रॉनों का संक्रमण हो जाता है, चूंकि इलेक्ट्रॉनों का वेग नाभिकों के वेग से ज्यादा होता है, अतः नाभिकों के दोलन करके अंतरनाभिकीय दूरी को परिवर्तित करने से पहले ही इलेक्ट्रॉनों का संक्रमण हो जाता है। चित्र में aa' से c में होने वाला संक्रमण इसी सिद्धांत पर आधारित है, जिससे इलेक्ट्रॉन वक्र (A) के निम्निष्ठ से वक्र (B) के निम्निष्ठ में न जाकर aa' से c में पहुंच जाते हैं।
फ्रेंक कॉण्डान सिद्धांत के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण की सर्वाधिक संभावना मूल इलेक्ट्रॉनिक अवस्था के मूल कम्पन ऊर्जा स्तर (v=0) के मध्य बिंदु से (न कि मूल कम्पन ऊर्जा के दोनों सिरों से) पहली उत्तेजित इलेक्ट्रॉनिक अवस्था के v=2 कम्पन ऊर्जा स्तर पर होती है। अतः v=0 से v=2 में होने वाला संक्रमण तीव्र बैण्ड उत्पन्न करेगा जबकि v=0 से v=3,4,5 पर संक्रमण की प्रायिकताएं इनकम होती है। इस लिंक पर जाए 👇👇👇 https://youtu.be/AQ-s4dFH4Kc By Manjit sahu
(c) घूर्णन स्पेक्ट्रम पर समस्थानिक प्रभाव(isotope effect on rotational spectrum) किसी तत्व के परमाणु जिनके परमाणु क्रमांक तो समान होते हैं किंतु उनके भार भिन्न-भिन्न होते हैं, उन्हें समस्थानिक कहते हैं। जब किसी अणु में किसी एक परमाणु को उसके समस्थानिक द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है तो बनने वाला नया अणु रासायनिक तौर पर तो पहले अणु के समान होता है, किंतु समस्थानिक से प्रतिस्थापन करने पर अणु का द्रव्यमान परिवर्तित हो जाता है जिससे अणु का जड़त्व आघूर्ण (I) में भी परिवर्तन होता है। चूंकि घूर्णन स्पेक्ट्रम में घूर्णन कारक
होता है। यदि प्रतिस्थापन करने वाले परमाणु का द्रव्यमान अधिक हो, तो इससे I का मान भी बढ़ेगा एवं B का मान कम हो जाएगा। चूंकि घूर्णन स्तर की ऊर्जा या तरंग संख्या B के मान के समानुपाती होती है।
अतः B का मान कम होने से घूर्णन स्पेक्ट्रम रेखाएं पास पास आ जाएगी। उदाहरणार्थ CO अणु में C12 परमाणु को उसके समस्थानिक C13 परमाणु से प्रतिस्थापित करने पर CO के घूर्णन स्पेक्ट्रम रेखाओं के बीच की दूरियां कम हो जाती है।
समस्थानिक प्रतिस्थापन के अनुप्रयोग(application of isotopic substitution) समस्थानिक प्रतिस्थापन कर घूर्णन स्पेक्ट्रम की सहायता से समस्थानिक का परमाणु भार ज्ञात किया जा सकता है। एक तत्व जिसके दो समस्थानिकों का द्रव्यमान m1 एवं m2 है, जिनसे बने अणुओं का जड़त्व आघूर्ण I1 एवं I2 तथा घूर्णन इससे स्थिरांक व अपचयित द्रव्यमान क्रमशः
समस्थानिक प्रतिस्थापन से अणु के अंतरनाभिकीय दूरी में या अणु की बंध लंबाई में कोई ज्यादा अंतर नहीं आता है।
इस तरह
की सहायता से अज्ञात समस्थानिक का परमाणु द्रव्यमान ज्ञात किया जा सकता है। (d)घूर्णन स्पेक्ट्रम के लिए आवश्यक शर्तें (१) घूर्णन स्पेक्ट्रम विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम के उस भाग से संबंध रखता है, जो 100 माइक्रोमीटर से 1 सेंटीमीटर के परास में है। अतः यह सुदूर अवरक्त और रेडियों आवृत्ति क्षेत्र के मध्य के क्षेत्र में बनता है। अतः घूर्णन स्पेक्ट्रम के लिए आवश्यक विद्युत चुंबकीय क्षेत्र की आवश्यकता है। (२)घूर्णन स्पेक्ट्रम केवल उन्हीं अणुओं में सक्रिय हो पाता है। जिनमें स्थाई द्विध्रुव आघूर्ण होता है। जैसे H2O,CO,HCl,CHCl3 इत्यादि में जबकि H2,N2,O2,Cl2 शुद्ध घूर्णन स्पेक्ट्रम नहीं प्रदर्शित करते, क्योंकि इनमें स्थाई द्विध्रुव आघूर्ण नहीं है। अनुप्रयोग (१) द्विपरमाणुवीय अणु के मध्य बंध की दूरी ज्ञात करने में-- घूर्णन करते हैं द्विपरमाणुक अणु की ऊर्जा
जहां, J का मान 0,1,2,3...... इत्यादि हो सकता है। J=घूर्णन क्वांटम संख्या, h= प्लांक स्थिरांक एवं I= जड़त्व आघूर्ण है। समीकरण (1) को तरंग संख्या के रूप में परिवर्तित करने पर,
जहां घूर्णन नियतांक है वरण सिद्धांत के अनुसार➖∆J=+-1 होता है। समीकरण (2) में J का मान रखने पर न्यूनतम ऊर्जा अंतर होगा।
m1 तथा m2 दो परमाणुओं के द्रव्यमान हैं तथा r उनके बीच की दूरी है, जिसे बंध लंबाई कहा जाता है।
(b)द्विपरमाणुक अणु के शुद्ध घूर्णन:- शुद्ध घूर्णन रमन स्पेक्ट्रा अणु की घूर्णन ऊर्जा में होने वाले संक्रमण के द्वारा प्राप्त होता है इस समय अणु की कम्पन्न ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। अतः शुद्ध घूर्णन स्पेक्ट्रा के लिए वरण नियम ∆J=0,+-2 यहां ∆J अणु की घूर्णन ऊर्जा में होने वाला परिवर्तन है।∆J=+-2 यह दर्शाता है। घूर्णन ऊर्जा के स्तर में दो स्तरों का परिवर्तन होना चाहिए। जबकि शुद्ध कम्पन रमन स्पेक्ट्रा के लिए वरण नियम (डेल न्यू) ∆u=+-1 एवं ∆J=0,+-2 होता है। (c) कंपनी स्पेक्ट्रम के लिए वरण नियम (selection rule for vibrational spectra) सरल आवर्ती दोलित्र या द्विपरमाणुक अणु के लिए समीकरण (3) के अनुसार कम्पन ऊर्जा स्तर संभव है किंतु कम्पन ऊर्जा स्तरों में संक्रमण निम्न वरण नियम का पालन करते हैं। (डेल न्यू) ∆u=+-1
अर्थात् द्विपरमाणुक अणु में कंपन ऊर्जा में संक्रमण एक ऊर्जा स्तर या नीचे ही हो सकती है। इस तरह अणु(न्यू) u=0 से (न्यू) u=1 या u=1 से u=2 में ऊर्जा अवशोषण के दौरान संक्रमण कर सकता है। डेल न्यू(∆u=-1) जबकि ऊर्जा उत्सर्जन करने पर अणु एक ऊर्जा स्तर नीचे (∆u=-1) आ सकता है। प्रत्येक प्रकार का कंपन ऊर्जा संक्रमण एक बैंड उत्पन्न करता है।
रैले प्रकीर्णन एवं रमन प्रकीर्णन:- जब एकवर्णी प्रकाश किसी पारदर्शी माध्यम से गुजरता है, तब प्रकाश का प्रकीर्णन होता है। प्रकिर्णीत प्रकाश में आपतित विकिरणों के समान आवृत्ति वाली विकिरण के अलावा उच्च तथा निम्न आवृत्ति वाली विकिरणें प्राप्त होती है। प्रकीर्णन द्वारा आपतित प्रकाश की आवृत्ति में परिवर्तन होने की घटना को रमन प्रभाव कहते हैं जबकि प्रकीर्णन द्वारा समान आवृत्ति वाला विकिरण प्राप्त होने की घटना को रैले टिण्डल प्रभाव कहते हैं। टिंडल प्रकीर्णन में प्रकीर्णित प्रकाश की आवृत्ति वही होती है, जो आपतित प्रकाश की होती है। इस प्रकीर्णन में फोटॉन और अणु में टक्कर प्रत्यास्थ होती है। प्रत्यास्थ टक्कर में अणु तथा फोटाॅन के बीच ऊर्जा का आदान प्रदान नहीं होता है। फोटॉन बिना किसी परिवर्तन के प्रकीर्णित हो जाता है। रमन प्रकीर्णन में प्रकीर्णित प्रकाश की आवृत्ति आपतित प्रकाश की आवृत्ति से भिन्न होती है। यदि प्रकीर्णित प्रकाश की आवृत्ति आपतित प्रकाश की आवृत्ति से कम होती है, तो स्टोक्स रेखा मिलती है। यदि प्रकीर्णित प्रकाश की आवृत्ति आपतित प्रकाश की आवृत्ति से अधिक होती है, तो प्रतिस्टोक्स रेखा मिलती है। रमन प्रभाव का स्पष्टीकरण:- क्वांटम सिद्धांत के अनुसार, विद्युत चुंबकीय विकिरण ऊर्जा कणों से बने होते हैं, जिन्हें फोटाॅन कहते हैं। ये फोटॉन पदार्थ के अणुओं से टकराते हैं यदि यह टक्कर प्रत्यास्थ हों तो फोटॉन बिना ऊर्जा खोये प्रकीर्णित हो जाते हैं तथा आपतित किरणों की दिशा के समकोण में रखे संसूचक में सामान आवृत्ति की किरणों के रूप में प्राप्त होते हैं। दूसरे शब्दों में आपतित विकिरण की आवृत्ति (न्यू) तथा प्रकीर्णित विकिरण की आवृत्ति (न्यू) एक समान होती है। यदि फोटॉन और पदार्थ के अणुओं के बीच की टक्कर अप्रत्यास्थ हो तो इनके मध्य उर्जा का आदान-प्रदान हो सकता है। रमन आवृत्ति तथा रमन विस्थापन:- रमन प्रभाव में आपतित प्रकाश एवं प्रकीर्णित प्रकाश की आवृत्तियों का अंतर रमन आवृत्ति या रमन विस्थापन कहलाता है। यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति न्यू आई हो तो रमन आवृत्ति न्यू आर का मान न्यू आर इक्वल न्यू आई माइनस न्यू एस या डेल न्यू इक्वल न्यू आई माइनस न्यू एस जहां न्यू आर रमन आवृत्ति एवं न्यू एस रमन विस्थापन है। रमन आवृत्ति का मान प्रकीर्णित करने वाले पदार्थ के लिए अभिलाक्षणिक होता है। यह आपतित प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर नहीं करता है। यदि टकराने से अणु फोटॉन से ∆E ऊर्जा प्राप्त करता है तो प्रकीर्णित फोटॉन की ऊर्जा (hu➖∆E) होगी तथा प्रकीर्णित विकिरण की आवृत्ति (u➖∆E/h) होगी जो आपतित विकिरण की आवृत्ति से कम होगी। (१)यदि प्रकीर्णन से मूल आवृत्ति से कम आवृत्ति की रेखाएं प्राप्त होती है, तो उन्हें स्टोक्स रेखाएं कहते हैं। (२)यदि प्रकीर्णन से मूल आवृत्ति से अधिक आवृत्ति की रेखाएं प्राप्त होती है, तो उन्हें प्रति स्टॉक्स रेखाएं कहते हैं। इस लिंक पर जाएं 👇👇👇 https://youtu.be/EXEcaOa2QCE
(a) शुद्ध घूर्णन स्पेक्ट्रम:- घूर्णन स्पेक्ट्रम विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम के उस भाग से संबंध रखता है, जो 100 माइक्रोमीटर से 1 सेंटीमीटर के परास में हैं। अतः यह सुदूर अवरक्त और रेडियो आवृत्ति क्षेत्र के मध्य के क्षेत्र में बनता है। घूर्णन स्पेक्ट्रम केवल उन्हीं अणुओं द्वारा दिया जाता है जिनमें स्थाई द्विध्रुव आघूर्ण होता है। जैसे- H2O,CO,HCl,CHCl3, जबकि H2,N2,O2,Cl2 शुद्ध घूर्णन स्पेक्ट्रम प्रदर्शित नहीं करते, क्योंकि इनमें स्थाई द्विध्रुव आघूर्ण नहीं होता है। (b) सभी माइक्रोवेव स्पेक्ट्रम (घूर्णन स्पेक्ट्रम) का अध्ययन गैसी अवस्था में किया जाता हैै, क्योंकि ठोस एवं द्रव अवस्था में अणु की घूर्णन ऊर्जा इन तरंगोंं से प्रभावित नहीं होती है। घूर्णन करते हुए द्विपरमाण्विक अणु को एक दृढ़ घूर्णक माना जाता जा सकता है। किसी दृढ़ घूर्णक द्विपरमाण्विक अणु की ऊर्जा
जहां J=घूर्णन क्वांटम संख्या, I= जड़त्व आघूर्ण,h= प्लांक नियतांक J का मान 0,1,2,3..... हो सकता है। समीकरण (१) को तरंग संख्या के रूप में परिवर्तित करने पर,
वरण नियम(selection rule) केवल वे ही घूर्णन संक्रमण संभव है, जिसमें घूूूूर्णन क्वांटम संख्या में परिवर्तन इकाई हो। अर्थात्
जहां ➕1 विकिरण के अवशोषण को तथा➖1 विकिरण के उत्सर्जन को प्रदर्शित करता है। यदि किसी अणु को J ऊर्जा स्तर से(J➕1) ऊर्जा स्तर में लाया जाए तो
समीकरण (3) में J=0,1,2,3..... रखने पर न्यू बार के मान क्रमशः 2B,4B,6B,8B...... प्राप्त होंगे। अतः J के मान में क्रमिक वृद्धि करने से अवशोषण स्पेक्ट्रम में जो रेखाएं प्राप्त होती है, वे क्रमशः 2B,4B,6B,8B....../cm पर स्थित होती है। उसी प्रकार ऊर्जा में क्रमिक कमी करने पर वैसा ही उत्सर्जन स्पेक्ट्रम प्राप्त होगा। अतः घूर्णी स्पेक्ट्रम में रेखाओं के मध्य स्थित दूरी 2B /cm होती है।
m1 तथा m2 दो परमाणुओं के द्रव्यमान हैं और r उनके बीच की दूरी है, जिसे बंध लंबाई कहा जाता है।
विद्युत चुंबकीय विकिरण:- किसी पदार्थ से उत्सर्जित होने वाली प्रकाश एवं ऊष्मा तरंगें विद्युत चुंबकीय विकिरणें होती है, इनकी द्वैत् प्रकृति होती है। यह कणिका तथा तरंग दोनों की तरह व्यवहार करती है। विद्युत चुंबकीय तरंगों के गमन के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है, अतः इनका वेग माध्यम पर निर्भर नहीं करता अर्थात् निश्चित होता है। ये तरंगे प्रकाश के वेग {c=2.998×10 power of 8 m/s ~ 3×10 power of 8 m/s) से गति करती है। इन तरंगों के साथ विद्युतीय एवं चुंबकीय क्षेत्र संबद्ध होते हैं, जो एक दूसरे के तथा विकिरण के संचरण की दिशा में लंबवत् होती है। विद्युत चुंबकीय विकिरणों को उनके तरंगदैर्ध्य के आधार पर रेडियो तरंगों से कॉस्मिक किरणों तक विभाजित किया जा सकता है। तरंगदैर्ध्य के घटते क्रम के आधार पर विभाजित
किए गए स्पेक्ट्रम क्षेत्र की ऊर्जा, तरंगदैर्ध्य घटने के साथ-साथ बढ़ती जाती है। भिन्न-भिन्न ऊर्जा वाली विद्युत चुंबकीय तरंगों का पदार्थ के साथ पारस्परिक क्रिया से अलग-अलग प्रकार के स्पेक्ट्रम उत्पन्न होते हैं जिन्हें सारणी में दर्शाया गया है।
तरंगदैर्ध्य (लेमडा):- किसी तरंग द्वारा एक पूर्ण चक्र में तय की गई दूरी तरंगदैर्ध्य कहलाती है। यह दो निकटतम शिखरों अथवा गर्त के मध्य की दूरी होती हैं, जिसे लेेमडा से दर्शातेे हैं।
आवृत्ति (न्यू):- किसी बिंदु से 1 सेकंड में गुजरने वाली तरंगों की संख्या को आवृत्ति कहते हैं, इसे चक्र प्रति सेकंड या हर्ट्ज से व्यक्त किया जाता है
तरंग संख्या (न्यू बार):- किसी विकिरण के तरंग दैर्ध्य के व्युत्क्रम को तरंग संख्या कहते हैं इसे न्यू बार द्वारा व्यक्त किया जाता है।